⭐विशेष⭐



10 सितम्बर -श्री वामनावतार द्वादशी, भगवान वामन की जयंती, ⭐श्री भुवनेश्वरी महाविद्या जयन्ती

14 सितम्बर - प्रतिपदा श्राद्ध, श्राद्ध प्रारंभ, पितृपक्ष प्रारंभ
पितृपक्ष 28 सितम्बर (सर्वपितृ अमावस्या) तक रहेगा।
12 जुलाई से 8 नवंबर 2019 तक चातुर्मास व्रत- इसके अंतर्गत चातुर्मास व्रत करने के इच्छुक व्रती को -
✴•श्रावण शुक्ल द्वादशी (12 अगस्त) को त्यागी गयी शाक-सब्जी का दान देकर श्रावण शुक्ल द्वादशी से (12 अगस्त से) - भाद्रपद शुक्ल द्वादशी पर्यंत (10 सितम्बर तक) दही का त्याग करते हैं (तक्र या मठ्ठा का निषेध नहीं है)
✴•भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को (10 सितम्बर को) दही का दान करके इसी दिन से (10 सितम्बर से) आश्विन शुक्ल द्वादशी पर्यंत (10 अक्टूबर तक) दूध का त्याग करना चाहिये
✴•आश्विन शुक्ला द्वादशी को(10 अक्टूबर को) दूध का दान करके इस दिन से (10 अक्टूबर से) कार्तिक शुक्ल एकादशी तक (यानि 8 नवंबर तक) दालों(अथवा किसी भी एक प्रकार की दाल) का त्याग करना चाहिये,
देवोत्थानी एकादशी के दिन( 8 नवम्बर को) दाल [तथा चातुर्मास में त्यागी गयी अन्य किसी वस्तु] का दान करके इस चातुर्मास व्रत का समापन करें।
- चातुर्मास्य व्रत की महिमा



आज - परिधावी नामक विक्रमी संवत्सर(2076), सूर्य दक्षिणायन, वर्षा ऋतु, आश्विन मास, कृष्ण पक्ष।
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नाग पंचमी का महत्व


    
तुर्मास के अंतर्गत आने वाले श्रावण मास जो नागेश्वर भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, के शुक्ल पक्ष की पंचमी अर्थात् नाग पंचमी का क्या महत्व है, आइये यह जानते हैं। यूं तो प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष वाली पंचमी का अधिष्ठाता नागों को बतलाया गया है। पर श्रावण शुक्ला पंचमी एक विशेष महत्व रखती है।  शायद ही कोई हो जो नाग/सर्प से अपरिचित होगा। लगभग हर जगह देखने को मिल जाते हैं ये सर्प। नाग हमेशा से ही एक रहस्य में लिपटे हुए रहे हैं इनके विषय में फैली अनेक किंवदंतियों के कारण। जैसे नाग इच्छाधारी होते हैं, मणि धारण करते हैं, मौत का बदला लेते हैं आदि-आदि। पर जो भी हो, सर्प छेड़ने या परेशान करने पर ही काटते हैं। आप अपने रास्ते जाइए साँप अपने रास्ते चला जाएगा। हाँ कभी मार्ग भटककर अचानक इनका घर में आ जाना डर का कारण हो सकता है पर ऐसे में या किसी भी परिस्थिति में इन साँपों को मारना नहीं चाहिएकोशिश यही करनी चाहिए कि इनको एक सुरक्षित स्थान पर छोड़ दिया जाये।  
भगवान नागेश्वर सदाशिव के गले का आभूषण हैं नाग
सर्प विष से विविध प्रकार की महत्वपूर्ण औषधियों का निर्माण किया जाता है, विशेष रूप से होम्योपैथी की दवाइयों में। हमारे हिन्दू धर्मग्रन्थों में भी नागों का वर्णन मिलता है कहीं भगवान शिव के गले के आभूषण के रूप में तो कहीं भगवान विष्णु के शेषनाग के रूप में। ऐसी मान्यता है कि शेषनाग ही श्रीरामचंद्र जी के भ्राता लक्ष्मण जी के रूप में अवतरित हुए थे।
तारा महाविद्या सर्पों के आभूषणों से युक्त कही गयी हैं।
कालिय नाम के नाग का मर्दन श्रीकृष्ण द्वारा किया गया था और तारा महाविद्या को भी सर्पों के आभूषणो से युक्त बतलाया गया है। यज्ञोपवीत का संस्कार करते समय भी उसमें रुद्रादि देवों के साथ साथ सर्पानावाहयामि कहकर सर्पों का आवाहन किया जाता है ताकि यज्ञोपवीत भली प्रकार द्विज की रक्षा कर सके।

भगवान विष्णु की शय्या शेषनाग ही श्रीरामचंद्र जी के भ्राता लक्ष्मण जी के रूप में अवतरित हुए थे।

      साँप को दूध पिलाना गलत है। कहीं-कहीं इस दिन कुप्रथा के चलते भूखे रखे गए साँपों को जबरन दूध पिलाकर मारा जाता है क्योंकि साँप दूध नहीं पीते; यदि पी भी लें तो पाचन न होने से या प्रत्यूर्जता से उनकी मृत्यु हो जाती है। एक भ्रांति सी फैली हुई है कि शास्त्रों में नाग को दूध पिलाने को कहा है जबकि ऐसा नहीं है। यदि कहीं ऐसी प्रथा हो तो- उसमें शास्त्रों का दोष नहीं है, ऐसा करने वालों या उनके पूर्वजों द्वारा ही अपने मन से उस प्रथा को जोड़ा गया है- यह समझें। शास्त्रों में तो पंचमी को नागों को दूध से स्नान करवाने को कहा गया है वह भी जरूरी नहीं कि नाग असली हो, ताँबे या गोबर या मिट्टी से बने नाग का ही स्नान/अभिषेक किया जाना चाहिए। पुराणों के अनुसार किसी भी पंचमी तिथि को जो नागों को दुग्धस्नान करवाता है उसके कुल को वासुकि, तक्षक, कालिय, मणिभद्र, ऐरावत, धृतराष्ट्र, कर्कोटक तथा धनञ्जय ये सभी नाग अभयदान देते हैं।

द्वापरयुग में कालिय नामक नाग का मर्दन श्री कृष्ण जी ने किया था।

      इस संबंध में श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को कही गयी एक कथा है कि एक बार राक्षसों व देवताओं ने मिलकर जब सागर मंथन किया था तो उच्चैःश्रवा नामक अतिशय श्वेत घोड़ा निकला जिसे देख नागमाता कद्रू ने अपनी सपत्नी/सौत विनता से कहा कि, देखो! यह अश्व श्वेतवर्ण का है परन्तु इसके बाल काले दिखाई पड़ रहे हैं।" तब विनता बोली, यह अश्व न तो सर्वश्वेत है, न काला है और न ही लाल रंग का। यह सुनकर कद्रू बोली, “अच्छा? तो मेरे साथ शर्त करो कि यदि मैं इस अश्व के बालों को कृष्णवर्ण का दिखा दूँ तो तुम मेरी दासी हो जाओगी और यदि नहीं दिखा सकी तो मैं तुम्हारी दासी हो जाऊँगी। विनता ने शर्त स्वीकार कर ली और फिर वो दोनों क्रोध करती हुई अपने-अपने स्थानों को चली गयीं। कद्रू ने अपने पुत्रों को सारा वृत्तान्त कह सुनया और कहा, “पुत्रों! तुम अश्व के बालों के समान सूक्ष्म होकर उच्चैःश्रवा के शरीर से लिपट जाओ, जिससे यह कृष्ण वर्ण का दिखने लगेगा और मैं शर्त जीतकर विनता को दासी बना सकूंगी। यह सुन नाग बोले, “माँ! यह छल तो हम लोग नहीं करेंगे, चाहे तुम्हारी जीत हो या हार। छल से जीतना बहुत बड़ा अधर्म है। पुत्रों के ऐसे वचन सुनकर कद्रू ने क्रुद्ध होकर कहा, “तुमलोग मेरी आज्ञा नहीं मानते हो, इसलिए मैं तुम्हें शाप देती हूँ कि तुम सब, पांडवों के वंश में उत्पन्न राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ में अग्नि में जल जाओगे। नागगण, नागमाता का यह शाप सुन बहुत घबड़ाये और वासुकि को साथ लेकर ब्रहमाजी को सारी बात कह सुनाई। ब्रह्मा जी ने कहा, वासुके! चिंता न करो। यायावर वंश का बहुत बड़ा तपस्वी जरत्कारू नामक ब्राह्मण होगा जिसके साथ तुम अपनी जरत्कारू नाम की बहिन का विवाह कर देना और वह जो भी कहे, उसका वचन स्वीकार लेना। उनका पुत्र आस्तीक उस यज्ञ को रोक तुम लोगों की रक्षा करेगा।” यह सुन वासुकि आदि नाग प्रसन्न हो उन्हें प्रणाम कर अपने लोक को चले गए। कालांतर में वह यज्ञ जब हुआ तो नाग पंचमी के दिन ही आस्तीक मुनि ने नागों की सहायता की थी। अतः उस दाह की व्यथा को दूर करने के लिए ही गाय के दुग्ध द्वारा नाग प्रतिमा को स्नान कराने की मान्यता है जिससे व्यक्ति को सर्प का भय नहीं रहता इसीलिए यह दंष्ट्रोद्धार पंचमी भी कहलाती है। 
     नागपंचमी को किसी भी समय घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर नागों के चित्र या एक-एक गोबर से नाग बनाकर उनका दही, दूध, दूर्वा, पुष्प, कुश, गंध, अक्षत और नैवेद्य अर्पित कर पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात ब्राह्मणों को यथाशक्ति भोजन करवाने से व्यक्ति के कुल में कभी सर्पों का भय नहीं होता। 'नमोsस्तु सर्व सर्पेभ्यो' सभी सर्पों को नाग पंचमी पर नमन...

टिप्पणियाँ

  1. नागचन्द्रेश्वर मंदिर : नागपंचमी विशेष
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    #हिन्दू धर्मावलंबियों समेत अन्य धर्मों में भी शायद ही कोई ऐसा मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर होगा जो वर्ष में एक दिन के लिए खुलता होगा, लेकिन महाकाल की नगरी उज्जैन में एक दुर्लभ नागचन्द्रेश्वर मंदिर है जिसके पट श्रावण शुक्ल पंचमी यानि की नाग पंचमी के दिन ही खुलते हैं| इस साल मंदिर के पट 23 जुलाई दिन सोमवार को खुलेंगे| यह मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर के सबसे उपरी तल पर स्थित है| हिंदू मान्यताओं के अनुसार सर्प भगवान शिव का कंठाहार और भगवान विष्णु का आसन है लेकिन यह विश्व का संभवत:एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान शिव, माता पार्वती एवं उनके पुत्र गणेशजीको सर्प सिंहासन पर आसीन दर्शाया गया है। इस मंदिर के दर्शनों के लिए नागपंचमी के दिन सुबह से ही लोगों की लम्बी कतारे लग जाती है|

    भगवान भोलेनाथ को अर्पित फूल व बिल्वपत्र को लांघने से मनुष्य को दोष लगता है। कहते हैं कि भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने से यह दोष मिट जाता है| महाकाल की नगरी में देवता भी अछूते नहीं रहे वह भी इस दोष से बचने के लिए नागचंद्रेश्वर का दर्शन करते हैं। ऐसा धर्मग्रंथों में उल्लेख है। भगवान नागचंद्रेश्वर को नारियल अर्पित करने की परंपरा है। पंचक्रोशी यात्री भी नारियल की भेंट चढ़ाकर भगवान से बल प्राप्त करते हैं और यात्रा पूरी होने पर मिट्टी के अश्व अर्पित कर उनका बल लौटाते हैं।

    मान्यता है कि सर्पो के राजा तक्षक ने भगवान भोलेनाथ की यहां घनघोर तपस्या की थी। तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और तक्षक को अमरत्व का वरदान दिया। ऐसा माना जाता है कि उसके बाद से तक्षक नाग यहां विराजित है, जिस पर शिव और उनका परिवार आसीन है। एकादशमुखी नाग सिंहासन पर बैठे भगवान शिव के हाथ-पांव और गले में सर्प लिपटे हुए है।

    इस अत्यंत प्राचीन मंदिर का परमार राजा भोज ने एक हजार और 1050 ई. के बीच पुनर्निर्माण कराया था। 1732 में तत्कालीन ग्वालियर रियासत के राणा जी सिंधिया ने उज्जयिनी के धार्मिक वैभव को पुन:स्थापित करने के भागीरथी प्रयास के तहत महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णोद्वार कराया।

    एक प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद इंद्र की सभा में कथा सुना रहे थे। इंद्र ने नारद जी से पूछा कि हे मुनि, आप त्रिलोक के ज्ञाता हैं। मुझे पृथ्वी पर ऐसा स्थान बताओ, जो मुक्ति देने वाला हो। यह सुनकर मुनि ने कहा कि उत्तम प्रयागराज तीर्थ से दस गुना ज्यादा महिमा वाले महाकाल वन में जाओ। वहां महादेव के दर्शन मात्र से ही सुख, स्वर्ग की प्राप्ति होती है। वर्णन सुनकर सभी देवता विमान में बैठकर महाकाल वन आए। उन्होंने आकाश से देखा कि चारों ओर साठ करोड़ से भी शत गुणित लिंग शोभा दे रहे हैं। उन्हें विमान उतारने की जगह दिखाई नहीं दे रही थी।

    इस पर निर्माल्य उल्लंघन दोष जानकर वे महाकाल वन नहीं उतरे, तभी देवताओं ने एक तेजस्वी नागचंद्रगण को विमान में बैठकर स्वर्ग की ओर जाते देखा। पूछने पर उसने महाकाल वन में महादेव के उत्तम पूजन कार्य को बताया। देवताओं के कहने पर कि वन में घूमने पर तुमने निर्माल्य लंघन भी किया होगा, तब उसके दोष का उपाय बताओ।

    नागचंद्रगण ने ईशानेश्वर के पास ईशान कोण में स्थित लिंग का महात्म्य बताया। इस पर देवता महाकाल वन गए और निर्माल्य लंघन दोष का निवारण उन लिंग के दर्शन कर किया। कहते हैं कि यह बात नागचंद्रगण ने बताई थी, इसीलिए देवताओं ने इस लिंग का नाम नागचंद्रेश्वर महादेव रखा।

    कैसे पहुंचे-

    उज्जैन शहर भोपाल-अहमदाबाद रेल खण्ड पर स्थित एक पवित्र धार्मिक नगर है। यहां हर गाड़ी रुकती है। इंदौर यहां से केवल 65 किलोमीटर दूर है। उज्जैन रेलवे स्टेशन से महाकालेश्वर मंदिर मात्र 3 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां आवागमन के साधन आसानी से मिल जाते हैं।

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