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एकादशी व्रत के उद्यापन की विस्तृत विधि

व्र त एक तप है तो उद्यापन उसकी पूर्णता है। उद्यापन वर्ष में एक बार किया जाता है इसके अंग हैं- व्रत , पूजन , जागरण , हवन , दान , ब्राह्मण भोजन , पारण । समय व जानकारी के अभाव में कम लोग ही पूर्ण विधि - विधान के साथ उद्यापन कर पाते हैं। प्रत्येक व्रत के उद्यापन की अलग - अलग शास्त्रसम्मत विधि होती है। इसी क्रम में शुक्ल और कृष्ण पक्ष की एकादशियों का उद्यापन करने की विस्तृत शास्त्रोक्त विधि आपके समक्ष प्रस्तुत है। वर्ष भर के 24 एकादशी व्रत किसी ने कर लिये हों तो वो उसके लिए उद्यापन करे। जिसने एकादशी व्रत अभी नहीं शुरु किये लेकिन आगे से शुरुआत करनी है तो वह भी पहले ही एकादशी उद्यापन कर सकते हैं और उस उद्यापन के बाद 24 एकादशी व्रत रख ले। कुछ लोग साल भर केवल कृष्ण पक्ष के 12 एकादशी व्रत लेकर उनका ही उद्यापन करते हैं तो कुछ लोग साल भर के 12 शुक्ल एकादशी व्रत लेकर उनका ही उद्यापन भी करते हैं। अतः जैसी इच्छा हो वैसे करे लेकिन उद्यापन अवश्य ही करे तभी व्रत को पूर्णता मिलती है। कृष्ण पक्ष वाले व्रतों का उद्यापन कृष्ण पक्ष की एकादशी-द्वादशी को करे , शुक्ल पक्ष वाले व्रतों का उ...


श्री गणेश चतुर्थी व्रत तथा स्यमन्तक मणि का अपकीर्तिनाशक आख्यान

भ गवान  श्रीगणेश   का   जन्म भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न   के समय   हुआ था। अत: यह   श्री गणेश चतुर्थी तिथि   मध्याह्नव्यापिनी लेनी चाहिये। इस दिन रविवार अथवा मंगलवार हो तो प्रशस्त है। गणेशजी हिन्दूधर्म   के   प्रथम पूज्य देवता  हैं। सनातन धर्मानुयायी स्मार्तों के देवताओं में विघ्नविनायक गणेशजी प्रमुख हैं। हिन्दुओं   के   घर   में   चाहे जैसी पूजा या   धार्मिक आयोजन   हो ,   सर्वप्रथम श्रीगणेशजी का   आवाहन और पूजन  किया जाता है। शुभ कार्यों मेँ गणेश   जी   की स्तुति का अत्यन्त महत्त्व माना गया है । गणेश जी  समस्त  विघ्नों   को दूर करने वाले देवता हैं। इनका मुख हाथी का ,   उदर लम्बा तथा शेष   शरीर मनुष्य के समान है। मोदक इन्हें विशेष प्रिय है।  बंगाल की   दुर्गापूजा   की तरह   ही   महाराष्ट्र में   गणेश जी की पूजा   एक   राष्ट्रीय   पर्व के   रूप में प्रतिष्ठित   है।


श्री जानकीनवमी व्रत पर श्री राम प्रिया सीता जी की पूजा का विधि-विधान

पू जा -विधि   अथवा व्रत विधि को पढ़ना मात्र भी आध्यात्मिक लाभ देता है क्योंकि इतने मात्र से भी मन से प्रभु का स्मरण हो जाता है।   हिन्दू-समाज में जिस प्रकार   श्री राम नवमी   का माहात्म्य   है ,   उसी प्रकार   श्री जानकी नवमी   का   भी है।       जिस  प्र का र अष्टमी तिथि भगवती राधा तथा भग वान  श्रीकृष्ण के आवि र्भाव  से सम्बद्ध है ,  उसी प्रकार नवमी तिथि भगवती सीता तथा भगवान् श्रीराम के आविर्भाव की तिथि होने से परमाद रणी या है ।  जिस प्रकार  भगवती रा धा  का आविर्भाव भाद्रपद शुक्ल अष्टमी और भग वान  श्रीकृष्ण का आविर्भाव भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को अर्थात् दो विभिन्न अष्टमी तिथियों में हुआ ,  उसी प्रकार भगवती सी ता का  आविर्भाव वैशाख शुक्ल नवमी   को  और भगवान् श्रीराम का आविर्भाव चैत्र शुक्ल न व मी को अर्थात् दो विभिन्न नवमी तिथियों मेँ हुआ।  हिंदू- मात्र के परमाराध्य श्रीसीताराम तथा श्रीराधा कृष्ण से  सम्बद्ध ये  जयन्ती  दिवस अति पावन ...


वासन्तीय या चैत्र नवरात्रों का महत्व

व सन्त ऋतु के आगमन के पश्चात एक के  बा द एक  व्रतोत्सव-पर्व- त्यौहारों के आने का क्रम प्रारम्भ होने लगता है ।   वसन्त  ऋतु   में  सभी के हृदय में रस का  संचा र होता है ,  सभी  उमंग से  भरे रहते हैं  इसी कारण  देव-देवी की पूजा इत्यादि में वे प्रसन्न रहते हैं।  साथ ही  बुरे कर्मों  को करने की प्रवृत्ति  से नर और नारी  को  बचाने के लिए  भी इन उत्सवों का प्रयोजन है।  वै शाख का पूरा महीना कुमारी  क न्याओं के लिए व्रत करने का  समय  है। कन्याएँ ठीक पथ पर र हें ,  इसलिए वैशाख के महीने में उनकी माँ ,  दादी इत्यादि व्रत करवाती हैं।  किसी मत से  फा ल्गु न और  चै त्र  मास में  वसन्त-ऋतु  मानी जाती  है और किसी के मत से  चै त्र और  वैशाख   मास में।  वै शाख का दूसरा नाम  ' माधव '  है और  चैत्र मास  का  ‘ मधु ’  नाम है।  हिंदू धर्म के प्रति आस्थावान श्रद्धालुगण वसन्त ऋतु में मधु मा...


विश्व-संस्कृति के रक्षक व प्रतिष्ठापक श्री मत्स्य भगवान की जयन्ती

भ गवान  श्रीहरि के चौबीस प्रमुख अवतार हैं, उन अवतारों की प्रादुर्भाव(जयन्ती) तिथि पर भक्तजन उत्सव किया करते हैं।   अवतारों की जयंती तिथियों पर श्रद्धालुगण उन अवतारों की विविध प्रकार से आराधना किया करते हैं।  पुराणों के अनुसार लीलाविहारी  परमकृपालु  भगवान् नारायण धर्म की संस्थापना के लिए समय-समय पर विविध अवतार लिया करते हैं।   चैत्र शुक्ल तृतीया श्रीमत्स्य भगवान की जयंती तिथि है।


वैदिक सोमयज्ञ होली का आध्यात्मिक रहस्य

हो ली  का पर्व आते ही सर्वत्र उल्लास छा जाता है।  हास-परिहास ,  व्यंग्य-विनोद ,  मौज-मस्ती और  मिलने जुलने का  प्रतीक लोकप्रिय पर्व हो ली वास्तव में एक वैदिक यज्ञ है ,  जिसका मूल स्वरूप आज विस्मृत हो गया है ।   आनन्दोल्लास का पर्व  होली प्रेम, सम्मिलन, मित्रता एवं एकता का पर्व है।  होलिकोत्सव में होलिका दहन के माध्यम से वैरभाव का दहन करके प्रेमभाव का प्रसार किया जाता है। होली के आयोजन के समय समाज में प्रचलित हँसी-ठिठोली ,  गायन-वादन ,  चाँचर (हुड़दंग) और अबीर इत्यादि के उद्भव और विकास को समझने के लिये हमें उस वैदिक सोमयज्ञ के स्वरूप को समझना पड़ेगा ,   जि सका  अनु ष्ठा न इस महापर्व के मूल में निहित है।


नवरात्र में श्री दुर्गा पूजा की विधि

भ वसागर से तारने वाली, परम दयालु, कष्टहारिणी, कृपाकारिणी श्री  दुर्गा जी की  नवरात्रि में शुक्ल प्रतिपदा के  दिन , अष्टमी को महापूजा में, जहाँ अष्टमी-नवमी तिथि मिलते हैं अर्थात् सन्धिपूजा में, प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को दुर्गा जी की उत्तम प्रकार से पूजा करनी चाहिये। अतएव नवरात्र या अन्य दिनों में भी जो श्री दुर्गा की  शास्त्रोक्त पूजा की जाती है उसका विधान यहाँ प्रामाणिक व शुद्ध रूप में प्रस्तुत है।  भगवती दुर्गा जी की पूजा करने के लिए  आसन पर पूर्वमुखी होकर  बैठ जाय।  जल से प्रोक्षण करे - अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं  स बाह्याभ्यंतरः शुचिः।। शिखा बाँधे। तिलक लगाकर आचमन करे - श्री केशवाय नमः। श्री नारायणाय नमः। श्री माधवाय नमः। आचमन के बाद अँगूठे के मूल भागसे होठों को दो बार पोंछकर ' श्री हृषीकेशाय नमः ' बोलकर हाथ धो ले। 3 बार प्राणायाम करे। पहले नवरात्रि में कलश स्थापना कर लें इसकी विधि के लिए यहां क्लिक करें। हाथ में जल-फूल लेकर संकल्प करे- विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ...


आमलकी एकादशी का पावन माहात्म्य

भ गवान् नारायण को प्रसन्न करने हेतु हमारे हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार  पवित्र एकादशी तिथियों पर उपवास रखने व श्रीहरि की आराधना करने का बहुत महत्व है। कुल 26 प्रकार की एकादशी तिथियाँ होती हैं।  फाल्गुन शुक्ला एकादशी को 'आमलकी' एकादशी नाम दिया गया है।   एकादशी व्रत के विधान से जुड़ी सामान्य बातें जानने के लिए यहाँ क्लिक करें ।  नारद पुराण के अनुसार आमलकी एकादशी को उपवास करके द्वादशी को प्रातःकाल संपूर्ण उपचारों से भगवान् पुण्डरीकाक्ष का भक्तिपूर्वक पूजन करे । तदनंतर ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे। इस प्रकार फाल्गुन शुक्लपक्ष में आमलकी नाम वाली इस एकादशी को विधिपूर्वक पूजन आदि करके मनुष्य भगवान् विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है।


महाशिवरात्रि का अद्भुत रहस्य [श्रीशिवपञ्चाक्षर स्तोत्रम्]

भ गवान  शिव के नाम का अर्थ ही 'कल्याण' है। दयालु धूर्जटी शिवजी की कृपा पाने को हर कोई लालायित रहता है। सभी शिवभक्तों को ज्ञात है कि महादेव शिवशङ्कर जी की उपासना हेतु सोमवार उत्तम दिवस है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी अर्थात्  महाशिवरात्रि के दिन तो औघड़दानी शम्भू श्रीमहादेव का विशेष आराधन किया जाता है। महाशिवरात्रि का पर्व परत्मात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मङ्गलसूचक है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि  कहलाती है। कृपानिधान शंकर भगवान हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि विकारों से मुक्त करके परम सुख शान्ति, ऐश्वर्यादि प्रदान करते हैं।


ज्ञानदायिनी सरस्वती माँ की अवतार कथा [श्रीसरस्वती स्तोत्रम्]

प्र तिभा की अधिष्ठात्री देवी भगवती सरस्वती हैं। समस्त वाङ्मय, सम्पूर्ण कला और पूरा ज्ञान-विज्ञान माँ शारदा का ही वरदान है। बुधवार को त्रयोदशी तिथि को एवं शारदीय नवरात्रों में ज्ञानदायिनी भगवती शारदा की पूजा-अर्चना-उपासना की जाती है। हमारे हिन्दू धर्मग्रंथों में माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी अर्थात् वसंत पंचमी को भगवती सरस्वती की जयंती का पावन दिन कहा गया है। बसन्त पंचमी के दिन माता शारदा की विशेष आराधना की जाती है, पूजन में पीले व सफेद पुष्प भगवती सरस्वती को अर्पित किये जाते हैं । वसन्त पञ्चमी के दिन भगवती सरस्वती के मंत्रों , पवित्र स्तोत्रों का पाठ किया जाता है , सफेद या पीले वस्त्र/रुमाल का दान किया जाता है।


पौष मास का माहात्म्य

ह मारे सनातन हिंदू धर्मग्रन्थों में प्रत्येक महीने के महत्व को भली प्रकार से दर्शाया गया है। हमारी हिंदू संस्कृति में बारहों मास व्रत-पर्व-त्यौहारों से युक्त हैं। आइये जानते हैं पौष मास के माहात्म्य को। पौष मास में धनु - संक्रान्ति होती है। अत: इस मास में भग वत् पूजन का विशेष महत्त्व है। दक्षिण भारत के मन्दि रों में धनुर्मास का उत्सव मनाया जाता है। मान्यता है कि  पौष कृष्ण अष्टमी को श्रा द्ध करके ब्रा ह्मण भोजन कराने से श्राद्ध का उत्तम फल मिलता है।


भगवान कालभैरव की महिमा [कालभैरवाष्टक]

भ गवान भैरव  अधर्म मार्ग को अवरुद्ध कर, धर्म-सेतु की प्रतिष्ठापना करते हैं।  देवराज इन्द्र भगवान कालभैरव के पावन चरणकमलों की भक्तिपूर्वक निरन्तर सेवा करते हैं। भगवान भैरव व्यालरूपी विकराल यज्ञसूत्र  धारण करने वाले हैं । शिवपुराण में कहा गया है-  ' भैरवः पूर्णरूपो हि शङ्करस्य परात्मन:। ' (शतरुद्र० ८।२) स्वभक्तों को अभीष्ट सिद्धि प्रदान करने वाले , काल को भी कँपा देने वाले , प्रचण्ड तेजोमूर्ति , अघटितघटन -सुघट-विघटन-पटु , काल भैरवजी भगवान्  शङ्कर के पूर्णावतार हैं , जिनका अवतरण ही पञ्चानन  ब्रह्मा एवं विष्णु के  गर्वापहरण के लिये हुआ था। भैरवी- यातना-चक्र में तपा-तपाकर पापियों के अनन्तानन्त पापों को  नष्ट कर देने की विलक्षण क्षमता इन्हें प्राप्त है।


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