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मकर-संक्रान्ति का महापर्व [श्री सूर्य स्तोत्राणि]

सू र्य ही पञ्चदेवों में एकमात्र ऐसे देव हैं जिनके दर्शन सर्वसुलभ और नित्य ही हुआ करते हैं । हनुमान जी इनके शिष्य तथा यमराज-शनिदेव इन्हीं के पुत्र हैं ।  जगत्  की समस्त घटनाएँ तो सूर्यदेव की ही लीला-विलास हैं। भगवान् सूर्य अपनी कर्म-सृष्टि-रचनाकाल की लीला से श्रीब्रह्मा-रूप में प्रात:काल में जगत् को प्रकाशित कर संजीवनी प्रदान कर प्रफुल्लित करते हैं। मध्याह्नकाल में ये आदित्य भगवान अपनी ही प्रचण्ड रश्मियों के द्वारा श्रीविष्णुरूप से सम्पूर्ण दैनिक कर्म-सृष्टि का आवश्यकतानुसार यथासमय पालन-पोषण करते हैं, ठीक इसी प्रकार भगवान् आदित्य सायाह्नकाल में अपनी रश्मियों के द्वारा श्रीमहेश्वररूप से सृष्टि के दैनिक विकारों को शोषित कर कर्म-जगत् को हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ और निरोग बनाते हैं ।


शनिदेव हैं सूर्यपुत्र तथा दंडाधिकारी [दशरथ कृत शनि स्तोत्र]

ह मारे हिंदू धर्मग्रन्थों में ज्येष्ठ मास की प्रतिपदा तिथि को   नारद जी की जयंती कहा गया है तथा ज्येष्ठ मास की अमावास्या को  'शनि जयंती'  बतलाई गई है। ध्यातव्य है कि कुंडली में कई योग ऐसे हैं जिनमें शनि ग्रह की क्रूर दृष्टि से जातक को पीड़ा मिलती है इसीलिए बहुत से लोग शनिदेव को क्रूर ग्रह मानते हैं पर वास्तव में शनि तो प्रारब्ध के बुरे कर्मों का फल ही देते हैं और अंत में जातक को धार्मिक भी बना देते हैं; और हमारे शास्त्रों में कहा भी गया है कि कोई भी ग्रह यदि बुरे प्रभाव दे या पीड़ा दे तो उसकी उपेक्षा मत कीजिये क्योंकि इससे तो और अधिक बुरे परिणाम मिलेंगे। बल्कि हमें उन ग्रहों को पूजना चाहिए। उनके निमित्त जपदान किया जाना चाहिए इससे उन ग्रहों द्वारा कुंडली में उत्पन्न अशुभता में कमी आती है।   स्वयं महादेव ने शनिदेव को बुरे कर्म करने वालों को दंड देने का अधिकार दिया था ।  ज्येष्ठी अमावास्या को दंडाधिकारी शनिदेव की जयंती कही गयी है।  उस पर भी शनैश्चरी अमावास्या पर शनि देव की स्तुति करने का बड़ा ही महत्व है। शनैः चरति ...


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