- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
द
|
स महाविद्याओं में सातवीं महाविद्या देवी धूमावती को ज्येष्ठा लक्ष्मी अर्थात् लक्ष्मी जी की बड़ी बहन भी कहा जाता है। धूमावती महाविद्या का स्वरूप कृशकाय, वृद्धा तथा विधवारूप है, उनके बाल बिखरे हुये हैं, ये जिस रथ पर बैठी हैं उसके ऊपर झंडा लगा हुआ है जिस पर कौए की आकृति विराजमान है। शूर्प धूमावती महाविद्या का मुख्य अस्त्र है जब सृष्टि के समापन का समय आता है तब अपने शूर्प में समस्त विश्व को समेट कर ये देवी महा-प्रलय कर देती हैं। धूमावती माँ शूर्प के साथ साथ मूसल नामक अस्त्र से भक्त के शत्रु का संहार करती हैं और जब भयानक रूप धारण करती हैं तब टेढ़े-मेढ़े दांत वाली हैं।
माँ धूमावती के मंदिर दुर्लभ ही हैं, मध्य प्रदेश के दतिया पीताम्बरा पीठ पर धूमावती महाविद्या का विग्रह स्थापित है जहां अनेकों श्रद्धालु धूमावती मां के दर्शन कर अपनी समस्याओं से मुक्ति पाते हैं। माँ धूमावती साधक के काम क्रोध, लोभ, मोह, घमंड, ईर्ष्या रूपी छः शत्रुओं का नाश करती हैं। माँ धूमावती को क्षुत्पिपासार्दिता कहा गया है, वास्तव में जीव को शिव तत्व का ज्ञान दिलाकर शिव में ही एकाकार कर देना और भौतिक जीवन में भी साधक को सभी कुछ प्रदान कर देना इनकी ममतामयी भूख-प्यास है। धूमावती माता को प्रेमपूर्वक पर्याप्त नैवेद्य भोग लगाना चाहिये ताकि माँ की कृपा बनी रहे।
प्रत्येक महाविद्या अपने आप में पूर्णब्रह्म-स्वरूपिणी है। धूमावती हृदय स्तोत्र में भगवती धूमावती को काली, भुवनेश्वरी, तारा, बगलामुखी, छिन्नमस्ता, षोडशी महाविद्याओं का ही स्वरूप बतलाया गया है। देवी धूमावती ही नारसिंही, गणेश-जननी और दुर्गा हैं। धूमावती महाविद्या का बीज मंत्र ‘ धूं ’ है। ध, ऊ एवं अर्धचन्द्र बिन्दु की उपस्थिति होने से धूं बीज में नाद, नादान्त, व्यापिनी, रोधिनी, समना, उन्मना शक्तियाँ व्याप्त हैं। धूं बीजाक्षर मंत्र में शक्ति का नाद मणिपुर चक्र से प्रारम्भ होकर नादान्त ब्रह्मरन्ध्र में प्रविष्ट होता है अर्थात वर्ण ध सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की शक्ति है, ऊ वर्ण विष्णु रूप होकर पालनकारिणी शक्ति का प्रतीक है तथा अर्ध चन्द्र बिन्दु शिव का प्रतीक है। विधिवत दीक्षित साधक द्वारा साधना करने से धूमावती महाविद्या ब्रह्मरन्ध्र में शिव-शक्ति के रूप में साधक को दर्शन देकर अन्त में अन्तर्लीन कर मोक्ष प्रदान करती है। इस प्रकार माँ धूमावती सृष्टि, स्थिति एवं अन्तर्लीन कला की स्वामिनी होकर विघ्नविनाशिनी, भक्तवत्सला, करूणामयी, दुःख हारिणी, मोक्षदायिनी माँ हैं। लेकिन गुरुजनों द्वारा सावधान किया जाता है कि धूमावती महाविद्या के काम्य प्रयोग तथा इनकी मन्त्र साधना गुरु दीक्षा लेकर शून्यागार(निर्जन स्थान) में ही करनी चाहिए अन्यथा हानिप्रद या निष्फल होती है।
परंतु अदीक्षित व्यक्ति अर्थात सामान्य साधक द्वारा चातुर्मास, ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी (धूमावती जयन्ती) व नवरात्रि की सप्तमी तिथि को 108 नामों द्वारा सौम्य उपासना के अंतर्गत शतार्चन उपासना की जा सकती है क्योंकि किसी को भी भगवान के नामों का जप करने से वंचित नहीं रखा गया है।
कब करें श्री धूमावती महाविद्या का पूजन- ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी (धूमावती जयन्ती) व नवरात्रि के अलावा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को धूमावती महाविद्या की आराधना की जा सकती है। एक अन्य मत के अनुसार धूमावती महाविद्या का अक्षय तृतीया की सायंकाल को मंगलवार को प्रादुर्भाव हुआ माना जाता है इसलिए अक्षय तृतीया भी इनकी पूजा करने के लिए उत्तम है। चातुर्मास(आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक) के चार महीनों के किसी भी दिन यह पूजन सम्पन्न किया जा सकता है।चातुर्मास के किसी दिन यदि मंगलवार या ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो वह भी धूमावती महाविद्या की आराधना के लिए उत्तम योग है।
*उपरोक्त दिवसों के अलावा महान् भय या महा उत्पात उपस्थित होने पर धूमावती अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करके माँ धूमावती से सहायता करने और भय व उत्पात दूर करने की प्रार्थना करें।
*अगर समयाभाव के कारण विस्तृत पूजा न कर सके तो नीचे दिये गये अष्टोत्तरशत नाम मन्त्रों या धूमावती अष्टोत्तरशत नाम स्तोत्र का या धूमावती हृदय स्तोत्र का केवल पाठ मात्र भी किया जा सकता है।
विशेष ध्यातव्य बात यह है कि धूमावती विद्या का घर पर स्थायी आवाहन नहीं होता है अर्थात् इन्हें अपने घर में चिरकाल विराजमान होने की भावना नहीं रखनी चाहिये। क्योंकि जहाँ ज्येष्ठा रहती है वहां उनकी बहन लक्ष्मी का निवास नहीं रहता। ज्येष्ठा लक्ष्मी या धूमावती दुःख, क्लेश व दरिद्रता की अधिष्ठात्री हैं। इसलिए इनकी पूजा व जप करते समय ऐसी भावना करनी चाहिये कि देवी प्रसन्न होकर मेरे समस्त विघ्न, रोग, दोष, क्लेश, प्रेतादि की बाधाओं को अपने शूर्प में समेट कर हमारे घर से विदा हो रही हैं और हमें धन, लक्ष्मी, सुख, शांति का आशीर्वाद दे रही हैं। अगर दुर्भाग्य भी काफी समय से पीछा कर रहा हो तो दुःख दरिद्रता की इस देवी को प्रसन्न कर घर से विदा होने की प्रार्थना करनी चाहिये इससे धन की प्राप्ति होती है। एक माँ के रूप में पूजे जाने पर ये भक्त का कल्याण ही करती हैं।
यहाँ आपके समक्ष धूमावती महाविद्या के पूजन का सौम्य रूप प्रस्तुत है इसमें धूमावती माँ का शतार्चन किया जाता है। इसमें सर्वप्रथम आवाहन किया जाता है और पूजन करके विसर्जन किया जाता है। अन्य देवियों के पूजन के लिए श्री सूक्त के मन्त्र प्रयुक्त होते हैं लेकिन धूमावती महाविद्या के पूजन में पुरुष सूक्त के वेदमन्त्र ही प्रयुक्त होते हैं।यह पूजा करते समय एक बात ध्यान में रहे कि जिनका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हुआ है यानि जनेऊ नहीं पहनते हैं और नित्य सन्ध्या अर्थात गायत्री मन्त्र जप नहीं करते हैं वे इस पूजा में वेद मन्त्र का पाठ न करें. सुविधा हेतु जहाँ वेद मन्त्र है वहाँ लिख दिया गया है।
सावधानी- काली तन्त्र, प्रपंचसार, आगम तत्वविलास आदि के अनुसार साधना में शूद्र, स्त्री और जिनका जनेऊ/उपनयन नहीं हुआ है वो ॐ और स्वाहा तथा वेदमन्त्र नहीं बोलें। ॐ की जगह ह्रीं या औं बोला जा सकता है।
श्री धूमावती महाविद्या का शतार्चन विधान
⭐ पूजा सामग्री :- शिवलिंग या शिव जी की प्रतिमा या चित्र, चौकी या लकडी का पाटा जिस पर पूजन करेंगे,एक तांबे की थाली, चंदन या हनुमान जी को चढ़ने वाला नारंगी सिन्दूर या पीला कुंकुम, सफेद तिल, पर्याप्त मात्रा में फूल ले लें (सफेद हों तो उत्तम है साथ में अन्य रंग के फूल भी ले सकते हैं), एक छोटी सी फूलमाला बना लें, सुगन्धित तेल, चावल, तुलसी दल(मंजरी), दूर्वा(दूब) , आरती का दिया, पूजा का दीपक, फल।
पंचामृत=दूध+दही में चीनी पाउडर डालें, ऊपर से तुरंत पिघला घी डाले फिर शहद डालकर मिलाएं।
नैवेद्य: माँ धूमावती को मूँग की पकौड़ी, समोसों, कचौड़ियों का भोग भी लगाया जाता है, इनके अलावा मिश्री या बताशे रखें या फिर खीर या फिर सूजी या आटे को चीनी व सौंफ आदि डालकर भूनकर प्रसाद बनाकर कटोरी में रख लें।
⭐ तैयारी :- एक पात्र में पर्याप्त दूर्वा, अक्षत, सफेद तिल, पुष्प रख लें। अर्घ्य के लिए शंख।
• मन्दिर में अपने सामने चौकी पर तांबे/स्टील की थाली में भगवा सिन्दूर या चन्दन या पीले कुंकुम से दिये गये धूमावती यन्त्र को बनाये। साफ कपड़े पर या चौकी पर भी यन्त्र बनाया जा सकता है।
इस यन्त्र को बनाए जो यह यन्त्र न बना सके वो केवल "धूं" बीजाक्षर को ही लिख ले इसे धूमावती महाविद्या का स्वरूप मानकर पूजित किया जाएगा,
शिवमूर्ति या शिवलिंग हो तो उसे भी सामने ही रख लें। गणेश जी की मूर्ति या चित्र भी रखें।
यन्त्र के सामने एक खाली कटोरी रख लीजिए जिसमें अर्घ्य, स्नान, आचमन आदि का जल छोड़ना होगा ताकि यन्त्र न बिगड़े।
⭐ धूमावती शतार्चन पूजा की विधि :-
• सर्वप्रथम 3 आचमन करे- ओऽम् श्री केशवाय नमः। श्री माधवाय नमः। श्री नारायणाय नमः। अब इस मन्त्र से जल भूमि पर छोड़ दें - श्री हृषीकेशाय नमः।
•अब जल छिड़ककर पवित्रीकरण करे - अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। य : स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।
•अब इस मन्त्र का उच्चारण कर आसन पर जल छिडकें - ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥
• संकल्प - अब हाथ में दूब फूल अक्षत जल लेकर संकल्प करे -
ओऽम् गणपतिर्जयति विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः हरि हरि नमः परमात्मने परब्रह्म पुरुषोत्तमाय ॐ तत्सत् श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्रीश्वेतवाराह-कल्पे वैवस्वत-मन्वन्तरे, अष्टाविंशति-तमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे भूप्रदेशे------प्रदेशे ---नगरे/ग्रामे----नाम्नि सम्वत्सरे सूर्य-(दक्षिणायने/उत्तरायणे)-----ऋतौ------मासे --------पक्षे , ----तिथौ, -----वासरे ------गोत्रोत्पन्न ------(नाम) अहं अद्य श्री धूमावत्याः प्रीति द्वारा काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्यात्मक षडरिपुशमनार्थं सर्वापच्छान्ति पूर्वकं दुःख दारिद्रय रोग विघ्न क्लेश शमनार्थं धूमावती अष्टोत्तरशत नामावल्याः यथा शक्ति श्री धूमावती यजनं कृत्वा श्री धूमावती अष्टोत्तरशत नाम स्तोत्रस्य पाठमहम् करिष्ये।
• गणेश पूजन - हाथ में फूल तथा दूर्वा लेकर कहे -
"सुमुख-श्चैकदन्तश्च कपिलो गज-कर्णक:।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्न-नाशो विनायक:।।
धूम्रकेतु-र्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजानन:।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि।।
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटेश्चैव विघ्न: तस्य न जायते।।
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ओऽम् श्रीमन्महागणाधिपतये नमः। वक्रतुण्डाय हुम् । श्री पादुकां पूजयामि।" अब फूल व दूर्वा गणेश जी को चढा दे
• "ओऽम् श्री गणेश विष्णु शिव दुर्गा सूर्येभ्यो नमः" मन्त्र बोलकर इन पांचों देवताओं को फूल चढ़ाए।
• गुरु पूजन - अब हाथ में तुलसी व पुष्प लेकर हाथ जोड़कर बोले - "श्री गुरोः दक्षिणामूर्ते भक्तानुग्रह कारक, अनुज्ञां देहि भगवन् श्रीधूमावत्यर्चनस्य मे। श्री दक्षिणामूर्ति शिव गुरवे नमः पादुकां पूजयामि।" फिर तुलसी व पुष्प को शिवलिंग या शिवजी की मूर्ति/चित्र पर चढ़ा दे
• अघोर शिव पूजन - शिव जी पर इस अघोर मन्त्र से चन्दन अक्षत व दूर्वा भी चढा दे-
"अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः शर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेस्तु रुद्ररूपेभ्यः।(-वेदमन्त्र)। श्री अघोरेश्वर शिवाय नमः पादुकां पूजयामि।"
• श्री धूमावती पूजन - कोई उपचार अर्पित करना यदि संभव न हो तो मनसा परिकलप्य समर्पयामि बोलकर अक्षत चढ़ा दे।
1.) ध्यानम् - हाथ में फूल लेकर ध्यान करे -
धूम्राभां धूम्रवस्त्रां प्रकटित-दशनां मुक्त-वालाम्बराढ्यां काकाङ्क-स्यन्दनस्थां धवल-करयुगां शूर्पहस्ताति-रूक्षाम्।
(माँ धूमावती धुएं सी आभा वाली, धूमिल वस्त्र धारण करने वाली, बाहर दिखाई देने वाले दाँतों से युक्त, बिखरे हुए केशों और वस्त्रों वाली, कौए के चिह्न से युक्त ध्वजा वाले रथ पर विराजित, धवल वर्ण के दोनों हाथों वाली, हाथों में सूप धारण करने वाली, रुक्ष शरीर वाली हैं)
नित्यं क्षुत्क्षान्तदेहां मुहुरति-कुटिलां वारिवाञ्छा-विचित्रां ध्यायेद् धूमावतीं वाम-नयनयुगलां भीतिदां भीषणास्याम्।।
(नित्य भूख-प्यास से आकुल विग्रह वाली, अत्यन्त कुटिल, जल की इच्छा से व्यग्र चित्त वाली, रोषयुक्त नेत्रयुगल वाली, भय देने वाली और भयंकर मुखमण्डल वाली देवी धूमावती का मैं ध्यान करता हूं)
विवर्णा चञ्चला कृष्णा दीर्घा च मलिनाम्बरा। विमुक्त-कुन्तला विधवा-विरलद्विजा॥
(खुले मुख वाली, चंचल, कृष्णवर्णा, लम्बी, मलीन वस्त्रों को धारण
करने वाली, खुले केशों वाली, रूक्ष, विधवा, टेढ़े-मेढ़े दाँतों वाली माँ धूमावती हैं)
काकध्वज-रथारूढा विलम्बित-पयोधरा। शूर्पहस्ताति-रक्ताक्षी धूतहस्ता वरान्विता॥
(कौए का ध्वज जिस रथ पर लगा हो उस पर बैठी हुई, लम्बे-लम्बे स्तनों वाली, हाथ में सूप ली हुई, अत्यन्त लाल आँखों वाली, काँपते हाथों वाली, वरमुद्रा से युक्त माँ धूमावती हैं)
प्रवृद्ध-घोणा तु भृशं कुटिला कुटिलेक्षणा। क्षुत्पिपासार्दिता नित्यं भयदा कलहास्पदा ॥
(बहुत बड़ी नाक वाली, अत्यन्त टेढ़ी, तिरछी दृष्टि से देखने वाली, भूख और प्यास से व्याकुल, सदा भय देने वाली, कलहप्रिय माँ धूमादेवी का मैं ध्यान करता हूँ)
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नम: ध्यायामि। कहकर यन्त्र पर पुष्प समर्पित करें।
2.) आवाहन - हाथ में पुष्प लेकर यन्त्र का स्पर्श करे और बोले-
ॐ धूम्रा बभ्रुनीकाशा पितॄणां सोमवतां बभ्रवो धूम्र-नीकाशाः। पितॄणां बर्हिषदां कृष्णा बभ्रुनीकाशाः पितॄणा-मग्निष्वात्तानां कृष्णाः पृषन्त-स्त्रैयम्बकाः॥(-वेदमन्त्र)।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्।
स भूमिं सर्वत स्पृत्वात्यतिष्ठद् - दशाङ्गुलम्॥(-वेदमन्त्र)।
देवेशि भक्ति सुलभे सर्वावरणसंयुते।
यावत्वां पूजयिष्यामि तावत् त्वं सुस्थिरा भव॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, आवाहनार्थे पुष्पं समर्पयामि।
3.) आसनम् - हाथ में अक्षत लेकर बोले -
ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।
उतामृत-त्वस्येशानो यदन्ने-नातिरोहति ।।(-वेदमन्त्र)।
अनेकरत्न-संयुक्तं नानामणि-गणान्वितम्।
एषः स्वर्णमयं दिव्यमासनं प्रति-गृह्यताम्॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, आसनार्थे अक्षतान् समर्पयामि।
4.) पाद्यम् - दूर्वा से जल छिड़के-
एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः। पादो ऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपाद-स्यामृतं दिवि॥(-वेदमन्त्र)।
गङ्गादिसर्व-तीर्थेभ्यो मया प्रार्थनया-हृतम्।
तोय-मेतत् सुखस्पर्श पाद्यार्थं प्रतिगृह्यताम्॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, पाद्यं समर्पयामि ।
5.) अर्घ्यम् - शंख से अर्घ्य दे -
त्रिपादूर्ध्वं उदैत्पुरुष: पादोस्येहाभवत्पुन:। ततो विष्वङ् व्यक्रामत्सा-शनानशने अभि॥(-वेदमन्त्र)।
गन्ध-पुष्पाक्षतैर्युक्तं अर्घ्यं सम्पादितं मया। गृहाण त्व॑ महादेवि प्रसन्ना भव सर्वदा॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्री धूमावत्यै नमः, अर्घ्यं समर्पयामि।
6.) आचमनीयम्
ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुष:। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्-भूमिमथो पुरः॥(-वेदमन्त्र)।
जाती-लवंग-कंकोल कर्पूरादि-सुवासितम् गृहाण देवेेशि एतदाचमनीयकम्॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः आचमनीयं जलं समर्पयामि।
7.) स्नानम् - स्नान के लिए आचमनी से ल चढ़ाए-
तस्माद्यज्ञात्-सर्वहुत: संभृतं पृषदाज्यम्। पशूंस्तां-श्चक्रे वायव्या-नारण्या ग्राम्याश्च ये ॥(-वेदमन्त्र)।
मन्दाकिन्या: समानीतै हेमाम्भोरुह-वासितै:। स्नानं कुरुष्व देवेशि सलिलैश्च सुगन्धिभि: ॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः स्नानीयं जलं समर्पयामि।
8.) पुनराचमनीयम्
उच्छिष्टो-प्यशुचिर्वापि यस्याः स्मरणमात्रत:। शुद्धि प्राप्नोेति तस्यै ते पुनराचमनीयकम्॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, पुनराचमनीयं जलं समर्पयामि!
9.) पञ्चामृत स्नानम्
पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः। सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत् - सरित्॥ पयो दधि घृतं चैव मधुं च शर्करयान्वितम्। पञ्चामृतं मयाऽनीतं स्नानार्थे प्रतिगृह्यताम्॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। आचमनीय जलं समर्पयामि।
10.) गन्धोदकस्नानम् - चन्दन युक्त जल चढ़ा दे-
त्वां गन्धर्वा अखनँस्त्वा-मिंद्रस्वां बृहस्पतिः। त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान्-यक्ष्मादमुच्यत॥(-वेदमन्त्र)।
मलयाचल-सम्भूतं चंदनागुरु-सम्भवम्। चन्दनं देव-देवशि स्नानार्थे प्रतिगृह्यताम्॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, गन्धोदकस्नानं समर्पयामि। शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। आचमनीयं जलं समर्पयामि।
11) वस्त्र -
तस्माद्यज्ञात्-सर्वहुतऽ ऋच: सामानि जज्ञिरे। छ्दांसि जज्ञिरे तस्माद्-यजुस्तस्मादजायत ॥(-वेदमन्त्र)।
वस्त्रञ्च सोमदैवत्यं लजायास्तु निवारणम्। मया निवेदितं भक्त्या गृहाण परमेश्वरि॥
सर्वशक्ति-युक्तायै श्री धूमावत्यै नमः वस्त्रम् समर्पयामि। आचमनीयं जल समर्पयामि।
12) यज्ञोपवीतम् -
ॐ तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मादस्माज्जाता अजावयः॥(-वेदमन्त्र)। सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, यज्ञोपवीतं समर्पयामि । यज्ञोपवोतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि ।
13) चन्दनम् -
ॐ तं यज्ञंबर्हिषि प्रौक्षन्पुरुष जातमग्रतः। तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च चे॥ (-वेदमन्त्र)। श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यम् सुमनोहरम्। विलेपनं च देवेशि चन्दन॑ प्रतिगृह्यताम्॥ सर्वशक्तियुक्तायै श्री धूमावत्यै नमः, चन्दनं समर्पयामि!
14) अक्षत -
अक्षतान् धवलान् दिव्यान् कुंकुमाक्तान् सुशोभनान्। गृहाणेमान् महादेवि प्रसीद परमेश्वरि॥ सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नम:, अक्षतान् समर्पयामि।
15) पुष्पमाला -
ॐ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू किं पादा उच्येते॥ (-वेदमन्त्र)।
पद्म शंख जपा-पुष्पैः शतपत्रै-र्विचित्रिताम्। पुष्पमालां प्रयच्छामि गहाण त्वं परमेश्वरि॥ सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै ममः, पुष्पमालां समर्पयामि ।
16) बिल्वपत्राणि
ॐ नमो बिल्मिने च कवचिने च नमो वर्मिणे च वरूथिने च नमः। श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुभ्याय चाहनन्याय च॥(-वेदमन्त्र)।
अमृतोद्धवः श्रीवृक्षो महादेवप्रिय: सदा। बिल्वपत्रं प्रयच्छामि पवित्रं ते परमेश्वरि॥ सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, बिल्वपत्राणि समर्पयामि।
17) दूर्वांकुर - दूब चढ़ाये -
ॐ काण्डात्काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि। एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन च॥(-वेदमन्त्र)।
विष्ण्वादि-सर्वदेवानां प्रियपत्रां सुशोभनीम्। क्षीरसागर-सम्भूतां दूर्वां स्वीकुरु सर्वदा॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, दूर्वांकुरान् समर्पयामि ।
18) तुलसीदल-
ॐ इदं विष्णु-र्विचक्रमे त्रेधा निदधे-पदम्। समूल्हमस्य पां सुरे स्वाहा॥ (-वेदमन्त्र)।
तुलसीं हेमरूपां व रत्नरूपां च मंजरीं भव मोक्षप्रदां तुभ्यमर्पयामि हरिप्रियाम्॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्री धूमावत्यै नमः, तुलसीदलं समर्पयामि!
19) आभूषण -
हार कङ्कण केयूर मेखला कुण्डलादिभिः । रत्नाढ्यं-कुण्डलोपेतं भूषणं प्रतिगृह्यताम्॥ सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, नानाआभूषणानि समर्पयामि।
20) सुगंधिद्रव्यम् - सुगन्धित तेल चढ़ाए -
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिम् पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ (-वेदमन्त्र)।
चन्दनागुरु-कर्पूरैः संयुतं कुङ्कुमं तथा। कस्तूर्यादि-सुगन्धांश्च सर्वांगेषु-विलेपनम्॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, सुगन्धिद्रव्यं समर्पयामि।
21) शतार्चन -: नीचे माँ धूमावती के 108 नाम मन्त्र दिये गये हैं, पूजन के लिए प्रत्येक मन्त्र में "पूजयामि" भी लगा लें जैसे- श्री धूमावत्यै नमः पूजयामि, श्री धूम्रवर्णायै नमः पूजयामि... आदि।
एक-एक करके तुलसी अक्षत आदि को इन नाम मन्त्रों से यन्त्र पर मां धूमावती को अर्पित करते जाएं-
ॐ श्री धूमावत्यै नमः पूजयामि। श्री धूम्रवर्णायै नमः पूजयामि। श्री धूम्र-पान-परायणायै नमः।
श्री धूम्राक्ष-मथिन्यै नमः। श्री धन्यायै नमः। श्री धन्यस्थान-निवासिन्यै नमः। श्री अघोराचार-सन्तुष्टायै नमः। श्री अघोराचार-मण्डितायै नमः। श्री अघोरमन्त्र-सम्प्रीतायै नमः। श्री अघोरमन्त्र-पूजितायै नमः।
श्री अट्टाट्टहास-निरतायै नमः। मलिनाम्बर-धारिण्यै नमः।
वृद्धायै नमः। विरूपायै नमः। विधवायै नमः।
विद्यायै नमः। विरलद्विजायै नमः। प्रवृद्ध-घोणायै नमः।
कुमुख्यै नमः। कुटिलायै नमः।
कुटिलेक्षणायै नमः। कराल्यै नमः। करालास्यायै नमः। कङ्काल्यै नमः। शूर्प-धारिण्यै नमः। काकध्वज-रथारूढायै नमः। केवलायै नमः। कठिनायै नमः। कुह्वै नमः। क्षुत्पिपासार्दितायै नमः।
नित्यायै नमः। ललज्जिह्वायै नमः। दिगम्बर्यै नमः।
दीर्घोदर्यै नमः। दीर्घरवायै नमः। दीर्घाङ्ग्यै नमः।
दीर्घ-मस्तकायै नमः। विमुक्त-कुन्तलायै नमः। कीर्त्यायै नमः। कैलासस्थान-वासिन्यै नमः।
क्रूरायै नमः। काल-स्वरूपायै नमः। कालचक्र-प्रवर्तिन्यै नमः। विवर्णायै नमः। चञ्चलायै नमः। दुष्टायै नमः। दुष्टविध्वंस-कारिण्यै नमः। चण्ड्यै नमः। चण्ड-स्वरूपायै नमः। चामुण्डायै नमः।
चण्ड-निःस्वनायै नमः। चण्ड-वेगायै नमः। चण्ड-गत्यै नमः। चण्ड-विनाशिन्यै नमः। मुण्ड-विनाशिन्यै नमः। चाण्डालिन्यै नमः। चित्ररेखायै नमः। चित्राङ्ग्यै नमः। चित्र-रूपिण्यै नमः। कृष्णायै नमः।
कपर्दिन्यै नमः। कुल्लायै नमः। कृष्णरूपायै नमः। क्रियावत्यै नमः। कुम्भ-स्तन्यै नमः। महोन्मत्तायै नमः। मदिरापान-विह्वलायै नमः। चतुर्भुजायै नमः। ललज्जिह्वायै नमः।
शत्रुसंहार-कारिण्यै नमः।
शवारूढायै नमः। शवगतायै नमः। श्मशानस्थान-वासिन्यै नमः। दुराराध्यायै नमः। दुराचारायै नमः। दुर्जनप्रीति-दायिन्यै नमः। निर्मांसायै नमः। निराकारायै नमः। धूतहस्तायै नमः। वरान्वितायै नमः।
कलहायै नमः। कलि-प्रीतायै नमः। कलि-कल्मष-नाशिन्यै नमः। महाकाल-स्वरूपायै नमः। महाकाल-प्रपूजितायै नमः। महादेव-प्रियायै नमः। मेधायै नमः। महासङ्कष्ट-नाशिन्यै नमः। भक्त-प्रियायै नमः। भक्तगत्यै नमः।
भक्तशत्रु-विनाशिन्यै नमः। भैरव्यै नमः। भुवनायै नमः।
भीमायै नमः। भारत्यै नमः। भुवनात्मिकायै नमः।
भेरुण्डायै नमः। भीम-नयनायै नमः। त्रिनेत्रायै नमः।
बहुरूपिण्यै नमः।
त्रिलोकेश्यै नमः। त्रिकालज्ञायै नमः। त्रिस्वरूपायै नमः। त्रयीतनवे नमः। त्रिमूर्त्यै नमः। तन्व्यै नमः। त्रिशक्तये नमः। त्रिशूलिन्यै नमः।
⭐श्री धूमावती महाविद्या तर्पण - उपरोक्त 108 नाम मन्त्रों के अंत में तर्पयामि जोड़कर दुग्ध मिश्रित जल आचमनी से देवी के विग्रह पर छोड़ते जाएं जैसे- श्री धूमावत्यै नमः तर्पयामि, श्री धूम्रवर्णायै नमः तर्पयामि...आदि
22) इसके बाद देवी धूमावती के अष्टोत्तरशत नाम स्तोत्र का पाठ करे (सम्भव हो तो 11 पाठ करे)-
श्री धूमावत्यष्टोत्तर-शत नाम स्तोत्रम्
ईश्वर उवाच
धूमावती धूम्रवर्णा धूम्रपान-परायणा। धूम्राक्ष-मथिनी धन्या धन्यस्थान-निवासिनी॥१॥
अघोराचार-सन्तुष्टा अघोराचार-मण्डिता। अघोरमन्त्र-सम्प्रीता अघोर-मन्त्रपूजिता॥ २॥
अट्टाट्टहास-निरता मलिनाम्बर-धारिणी। वृद्धा विरूपा विधवा विद्या च विरलद्विजा॥३॥
प्रवृद्ध-घोणा कुमुखी कुटिला कुटिलेक्षणा। कराली च करालास्या कङ्काली शूर्प-धारिणी॥४॥
काकध्वज-रथारूढा केवला कठिना कुहूः। क्षुत्पिपासार्दिता नित्या ललज्जिह्वा दिगम्बरी॥५॥
दीर्घोदरी दीर्घरवा दीर्घाङ्गी दीर्घ-मस्तका। विमुक्त-कुन्तला कीर्त्या कैलास-स्थानवासिनी॥६॥
क्रूरा काल-स्वरूपा च कालचक्र-प्रवर्तिनी। विवर्णा चञ्चला दुष्टा दुष्टविध्वंस-कारिणी॥७॥
चण्डी चण्डस्वरूपा च चामुण्डा चण्डनिस्स्वना।
चण्डवेगा चण्डगति-श्चण्डमुण्ड-विनाशिनी॥८॥
चाण्डालिनी चित्ररेखा चित्राङ्गी चित्र-रूपिणी।
कृष्णा कपर्दिनी कुल्ला कृष्णरूपा क्रियावती॥९॥
कुम्भस्तनी महोन्मत्ता मदिरापान-विह्वला। चतुर्भुजा ललज्जिह्वा शत्रुसंहार-कारिणी॥१०॥
शवारूढा शवगता श्मशानस्थान-वासिनी। दुराराध्या दुराचारा दुर्जनप्रीति-दायिनी॥११॥
निर्मांसा च निराकारा धूतहस्ता वरान्विता। कलहा च कलिप्रीता कलिकल्मष-नाशिनी॥१२॥
महाकाल-स्वरूपा च महाकाल-प्रपूजिता। महादेव-प्रिया मेधा महासङ्कट-नाशिनी॥१३॥
भक्तप्रिया भक्तगतिर्भक्त-शत्रुविनाशिनी। भैरवी भुवना भीमा भारती भुवनात्मिका॥१४॥
भेरुण्डा भीम-नयना त्रिनेत्रा बहुरूपिणी। त्रिलोकेशी त्रिकालज्ञा त्रिस्वरूपा त्रयीतनुः॥१५॥
त्रिमूर्तिश्च तथा तन्वी त्रिशक्तिश्च त्रिशूलिनी।
इति धूमामहत्स्तोत्रं नाम्नामष्टोत्तर-शतात्मकम्॥१६॥
मया ते कथितं देवि शत्रुसङ्घ-विनाशनम्।
(शिवजी बोले-इस प्रकार यह काम क्रोधादि शत्रुनाशक अष्टोत्तरशतनाम वाला महान् धूमास्तोत्र मेरे द्वारा कहा गया)
कारागारे रिपुग्रस्ते महोत्पाते महाभये॥१७॥
इदं स्तोत्रं पठेन्मर्त्यो मुच्यते सर्वसङ्कटैः।
(इस मर्त्यलोक में व्यक्ति यदि कारागार में हो या बंधन में होने पर या शत्रु से त्रस्त होने, महान् उत्पात में, महान् भय में इस स्तोत्र के पाठ करने से साधक सभी संकटों से मुक्त हो जाता है)
गुह्याद्गुह्यतरं गुह्यं गोपनीयं प्रयत्नतः॥१८॥ चतुष्पदार्थदं नॄणां सर्व-सम्पत्प्रदायकम्॥ १९॥
(यह स्तोत्र गुप्त से भी गुप्त है इसे प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए, यह धर्म,अर्थ,काम, मोक्ष देने के साथ-साथ सभी सम्पत्ति को भी देने वाला है)
॥श्री धूमावत्यष्टोत्तर-शत नाम स्तोत्रं शुभमस्तु ओऽम् तत्सत्॥
23) धूपम् - धूप दिखाए -
ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽअजायत।(-वेदमन्त्र)।
दशाङ्गगुग्गुलं धूपं चन्दनागुरु संयुतम्।
समर्पितं मया भक्त्या महादेवि प्रगृह्यताम्॥
सर्वशक्ति युक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, धूपमाघ्रापयामि।
24) दीपम् - दिया दिखाए -
ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। श्रोत्रा-द्वायुश्च मुखादग्नि-रजायत॥(-वेदमन्त्र)।
घृत वर्ति-समायुक्तं महातेजो महोज्ज्वलम्। दीपं दास्यामि देवेशि सुप्रीता भव सर्वदा॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, दीपं दर्शयामि ।
हस्त प्रक्षालनम्। (हाथ धो लें)
25) नैवेद्यम्
ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्।(-वेदमन्त्र)।
अन्नं बहुविधं स्वादु रसैः षड्भिः समन्वितम्।
नैवेद्यं गृह्यतां देवि भक्तिं मे ह्यचलां कुरु ॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, नैवेद्यं निवेदयामि ।
नैवेद्य भोग लगाए
मध्ये आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमनी से जल अर्पित करें।)
उत्तरापोऽशनार्थे पुनर्नैवेद्यं निवेदयामि।
(पुनः नैवेद्य में पंचामृत पात्र रखे)
हस्त-प्रक्षालनार्थे मुख-प्रक्षालनार्थे च जलं समर्पयामि ।
पुनराचमनीयं जलं समर्पयामि।
बोलकर आचमनी से दो बार जल अर्पित करें।
26) करोद्वर्तनम्
करोद्वर्तनकं देवि! सुगन्धैः परिवासितैः ।
गृहीत्वा मे वरं देहि परत्र च परां गतिम्॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, करोद्वर्तनार्थे गन्धं समर्पयामि।
देवी को चन्दन अर्पित करें।
हस्त-प्रक्षालनार्थं जलं समर्पयामि।
(जल चढाये)
27) ऋतुफलम् - पांच फल अर्पित करें -
ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः ।
बृहस्पति-प्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वं हसः॥(-वेदमन्त्र)।
नारिकेलं च नारिङ्गं कलिङ्गं मञ्जिरं तथा।
उर्वारुकं च देवेशि फलान्येतानि गृह्यताम्॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, ऋतुफलं समर्पयामि।
28) ताम्बूलम्
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञ-मतन्वत।
वसन्तोऽ-स्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥(-वेदमन्त्र)।
एला-लवङ्ग-कस्तूरी-कर्पूरैः पुष्प-वासिताम्।
वीटिकां मुखवासार्थ-मर्पयामि परमेश्वरि।
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, मुखवासार्थ ताम्बूलं (पूगीफल-एला-लवङ्गसहितम्) समर्पयामि।
29)दक्षिणाम्
ॐ हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम्॥(-वेदमन्त्र)।
पूजाफल-समृद्ध्यर्थ तवाने परमेश्वरि।
अर्पितं तेन मे प्रीता पूर्णान् कुरु मनोरथान्॥
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, दक्षिणां समर्पयामि ।
30) प्रदक्षिणा-
देवी को चढ़ाया फल हाथ में लेकर नीचे के मन्त्र बोलकर एक प्रदक्षिणा करे फिर फल जहाँ चढ़ाया था वापस रख दें-
ॐ ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः।
तेषां सहस्र-योजनेऽव धन्वानि तन्मसि॥(-वेदमन्त्र)।
काय-वाङ्मानसं पापं यत्कृतं जन्म-जन्मनि।
तन्मे नाशय देवि त्वं प्रदक्षिण-विधानतः ।।
यानि कानि च पापानि ज्ञाताज्ञात-कृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे ।।
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, प्रदक्षिणां समर्पयामि।
31) धूमावती-हृदय स्तोत्र द्वारा स्तुति -
• हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़े-
ॐ अस्य श्री धूमावतीहृदय-स्तोत्र मन्त्रस्य पिप्पलाद ऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः , श्री धूमावती देवता, धूं बीजम् , ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्, धूमावती महाविद्या प्रीत्यर्थे स्तुतिपाठे विनियोगः॥ अब जल भूमि पर छोड़ दें।
• हाथ में फूल लेकर धूमावतीहृदय स्तोत्र द्वारा स्तुति करे-
ॐ
धूम्राभां धूम्रवस्त्रां प्रकटित-दशनां मुक्त-बालाम्बराढ्यां काकाङ्क-स्यन्दन-स्थां धवल-कर-युगां शूर्प-हस्ताति-रूक्षाम्।
नित्यं क्षुत्क्षान्तदेहां मुहुरति-कुटिलां वारि-वाञ्छा-विचित्रां ध्यायेद् धूमावतीं वाम-नयन-युगलां भीतिदां भीषणास्याम्॥१॥
कल्पादौ या कालिकाद्याऽ-चीकलन्- मधुकैटभौ। कल्पान्ते त्रिजगत्सर्वं धूमावतीं भजामि ताम् ॥२॥
खट्वाङ्ग-धारिणी खर्वा खण्डिनी खल-रक्षसाम्। धारिणी खेटकस्यापि धूमावतीं भजामि ताम्॥३॥
गुणागाराऽ-गम्य-गुणा या गुणा गुण-वर्द्धिनी। गीता-वेदार्थ-तत्त्वज्ञै-र्धूमावतीं भजामि ताम्॥४॥
घूर्ण-घूर्णकरा घोरा घूर्णिताक्षी घनस्वना। घातिनी घातकानां या धूमावतीं भजामि ताम्॥५॥
चर्वन्ती-मस्थि-खण्डानां चण्डमुण्ड-विदारिणीम्। चण्डाट्ट-हासिनीं देवीं भजे धूमावतीमहम् ॥६॥
छिन्नग्रीवां क्षताच्छन्नां छिन्नमस्ता-स्वरूपिणीम्। छेदिनीं दुष्ट-सङ्घानां भजे धूमावतीमहम् ॥७॥
जाता या याचिता देवैरसुराणां विघातिनीम्। जल्पन्ती बहु-गर्जन्ती भजे तां धूम्ररूपिणीम् ॥८॥
झङ्कार-कारिणीं झञ्झा-झञ्झमा-झम-वादिनीम्। झटित्या-कर्षिणीं देवीं भजे धूमावतीमहम्॥९॥
टीप-टङ्कार-संयुक्तां धनुष्टङ्कार-कारिणीम्। घोरा घन-घटाटोपां वन्दे धूमावतीमहम्॥१०॥
ठं ठं ठं ठं मनुप्रीतिं ठः ठः मन्त्र-स्वरूपिणीम्। ठमकाह्व-गतिप्रीतां भजे धूमावतीमहम्॥११॥
डमरू-डिण्डिमा-रावां डाकिनीगण-मण्डिताम्। डाकिनी-भोग-सन्तुष्टां भजे धूमावतीमहम् ॥१२॥
ढक्का-नादेन सन्तुष्टां ढक्का-वादक-सिद्धिदाम्। ढक्का-वाद-चलच्चित्तां भजे धूमावतीमहम् ॥१३॥
तत्त्व-वार्त्ता-प्रियप्राणां भव-पाथोधि-तारिणीम्। तार-स्वरूपिणीं तारां भजे धूमावतीमहम् ॥१४॥
थां थीं थूं थें मन्त्ररूपां थैं थौं थं थः स्व-रूपिणीम्। 'थ'कार-वर्ण-सर्वस्वां भजे धूमावतीमहम्॥१५॥
दुर्गा-स्वरूपिणीं देवीं दुष्टदानव-दारिणीम्। देवदैत्य-कृत-ध्वंसां वन्दे धूमावतीमहम्॥१६॥
ध्वान्ताकारान्धक-ध्वंसां मुक्त-धर्माम्बु-धारिणीम्। धूमधारा-प्रभां धीरां भजे धूमावतीमहम् ॥१७॥
नर्त्तकी-नटन-प्रीतां नाट्यकर्म-विवर्द्धिनीम् । नारसिंही-न्नराराध्यां नौमि धूमावतीमहम् ॥१८॥
पार्वतीपति-सम्पूज्यां पर्वतो-परिवासिनीम् । पद्मारूपां पद्मपूज्यां नौमि धूमावतीमहम् ॥१९॥
फूत्कार-सहित-श्वासां फट् मन्त्रफल-दायिनीम्। फेत्कारिगण-संसेव्यां सेवे धूमावतीमहम् ॥२०॥
बलिपूज्यां बलाराध्यां बगला-रूपिणीं वराम्। ब्रह्मादि-वन्दितां विद्यां वन्दे धूमावतीमहम् ॥२१॥
भव्यरूपां भवाराध्यां भुवनेशी-स्वरूपिणीम्। भक्तभव्य-प्रदां देवीं भजे धूमावतीमहम्॥२२॥
मायां मधुमतीं मान्यां मकरध्वज-मानिताम्। मत्स्य-मांस-मदास्वादां मन्ये धूमावतीमहम्॥२३॥
योगयज्ञ-प्रसन्नास्यां योगिनी-परिसेविताम्। यशोदां यज्ञ-फलदां यजे धूमावतीमहम्॥२४॥
रामाराध्य-पदद्वन्द्वां रावणध्वंस-कारिणीम्। रमेश-रमणीं पूज्यामहं धूमावतीं-श्रये॥२५॥
लक्षलीला-कला-लक्ष्यां लोकवन्द्य-पदाम्बुजाम्। लम्बितां बीज-कोशाढ्यां वन्दे धूमावतीमहम्॥२६॥
वकपूज्य-पदाम्भोजां वकध्यान-परायणाम्। बालां वकारि-सन्ध्येयां वन्दे धूमावतीमहम्॥२७॥
शङ्करीं शङ्कर-प्राणां सङ्कटध्वंस-कारिणीम्। शत्रुसंहारिणीं शुद्धां श्रये धूमावतीमहम् ॥ २८॥
षडाननारि-संहन्त्रीं षोडशी-रूपधारिणीम्। षड्रसा-स्वादिनीं सौम्यां सेवे धूमावतीमहम्॥ २९॥
सुर-सेवित-पादाब्जां सुरसौख्य-प्रदायिनीम्। सुन्दरीगण-संसेव्यां सेवे धूमावतीमहम्॥ ३०॥
हेरम्ब-जननीं योग्यां हास्य-लास्य-विहारिणीम्। हारिणीं शत्रु-सङ्घानां सेवे धूमावतीमहम्॥ ३१॥
क्षीरोदतीर-संवासां क्षीरपान-प्रहर्षिताम्। क्षणदेशेज्य-पादाब्जां सेवे धूमावतीमहम्॥३२॥
ओऽम्
चतुस्त्रिंशद्वर्णकानां प्रति-वर्णादि-नामभिः। कृतं तु हृदयस्तोत्रं धूमावत्यां सुसिद्धिदम् ॥
(34 वर्णों में से प्रत्येक वर्ण द्वारा किया गया यह स्तोत्र उत्तम सिद्धि देने वाला है)
य इदं पठति स्तोत्रं पवित्रं पापनाशनम् । स प्राप्नोति परां सिद्धिं धूमावत्याः प्रसादतः ॥
(जो इस पाप का नाश करने वाले स्तोत्र को पढ़ता है उसे श्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त होती है)
पठन्नेकाग्र-चित्तो यो यद्यदिच्छति मानवः । तत्सर्वं समवाप्नोति सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥
(मैं बिल्कुल सत्य बोलता हूं कि इस स्तोत्र को एकाग्र चित्त से पढ़ने से मानव जो जो इच्छा करता है वह सब उसे प्राप्त होता है)
श्री धूमावतीहृदयं शुभमस्तु ओऽम् तत्सत् , सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, स्तुतिं समर्पयामि। कहकर पुष्प समर्पित करे।
⭐श्री धूमावती महाविद्या हवन - यदि हवन करना सम्भव हो तो उपरोक्त 108 नाम मन्त्रों के द्वारा हवन भी सम्पन्न किया जा सकता है जैसे - श्री धूमावत्यै नमः स्वाहा, श्री धूम्रवर्णायै नमः स्वाहा.. आदि
• क्षमा याचना व जप समर्पण -
हाथों को जोड़कर कहे -
आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम्। पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि। मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे। अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि।
आचमनी में जल लेकर यन्त्र पर छिड़के-
गुह्याति-गुह्य-गोप्त्री त्वं, गृहाणा-स्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देवि! त्वत्-प्रसादान्महेश्वरि! अनेन यथाशक्ति कृतेन धूमावती यजन कर्मणाः श्री धूमावती महाविद्या प्रीयन्तां, न मम।
32) उद्वासन(विसर्जन)
अब थाली(यन्त्र) में अक्षत छोड़ते हुए निम्न मन्त्र बोले-
गच्छ-गच्छ धूमावत्यम्बे स्वस्थानं परमेश्वरि! मया कृतेन पूजनेन प्रसीद सुरेश्वरि!
उत्तमे शिखरे देवि भूम्यां पर्वतमूर्द्धनि। ब्राह्मणेभ्यो-भ्यनुज्ञातो गच्छ देवि यथासुखम्।।
सर्वशक्तियुक्तायै श्रीधूमावत्यै नमः, श्रीधूमावतीं उद्वासयामि नमः।
फिर आसन के नीचे जल के छींटे देकर मस्तक पर लगाकर कहे -
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञ क्रियादिषु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्।। विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः हरि-स्मरणात् परिपूर्णतास्तु।
॥श्री धूमावती-पूजनम् शुभम्भूयात् ओऽम् तत्सत्॥
इसके पश्चात प्रसाद व दक्षिणा आदि को यथा स्थान रखकर थाली में स्थित पुष्प अक्षत आदि को और थाली पर बने यन्त्र को धोकर उसका पानी भी किसी पवित्र पेड़ की जड़ में डाल दे। इसके बाद पूजाघर में बैठकर लक्ष्मी जी के स्तोत्रों का पाठ अवश्य करे = कुछ स्तोत्र हमने "लक्ष्मी प्रीतिकर स्तोत्राणि" में दिये हैं।
इस प्रकार यह धूमावती महाविद्या की सौम्य शतार्चन विधि सम्पन्न होती है। माँ की कृपा से सब मंगल हो। ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी अर्थात धूमावती महाविद्या जयंती पर माँ धूमावती व माँ लक्ष्मी के चरणों में हमारा बारम्बार प्रणाम...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
कृपया टिप्पणी करने के बाद कुछ समय प्रतीक्षा करें प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है। अंतर्जाल (इन्टरनेट) पर उपलब्ध संस्कृत में लिखी गयी अधिकतर सामग्री शुद्ध नहीं मिलती क्योंकि लिखने में उचित ध्यान नहीं दिया जाता यदि दिया जाता हो तो भी टाइपिंग में त्रुटि या फोंट्स की कमी रह ही जाती है। संस्कृत में गलत पाठ होने से अर्थ भी विपरीत हो जाता है। अतः पूरा प्रयास किया गया है कि पोस्ट सहित संस्कृत में दिये गए स्तोत्रादि शुद्ध रूप में लिखे जायें ताकि इनके पाठ से लाभ हो। इसके लिए बार-बार पढ़कर, पूरा समय देकर स्तोत्रादि की माननीय पुस्तकों द्वारा पूर्णतः शुद्ध रूप में लिखा गया है; यदि फिर भी कोई त्रुटि मिले तो सुधार हेतु टिप्पणी के माध्यम से अवश्य अवगत कराएं। इस पर आपकी प्रतिक्रिया व सुझाव अपेक्षित हैं, पर ऐसी टिप्पणियों को ही प्रकाशित किया जा सकेगा जो शालीन हों व अभद्र न हों।