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श्री त्रिपुरसुन्दरी षोडशी महाविद्या की स्तोत्रात्मक उपासना [श्रीविद्या खड्गमाला]

प्र त्येक धर्मशील जिज्ञासु के मन में ये प्रश्न उठते ही हैं कि जीव का ब्रह्म से मिलन कैसे हो? जीव की ब्रह्म के साथ एक-रूपता कैसे हो? इस हेतु हमारे आगम ग्रंथों में अनेक विद्याएँ उपलब्ध हैं। शक्ति-उपासना में इसी सन्दर्भ में दश-महाविद्याएँ भी आती हैं। उनमें महाविद्या भगवती षोडशी अर्थात श्रीविद्या का तीसरा महत्त्व-पूर्ण स्थान है, श्रीविद्या को सामान्य रूप से,  श्री प्राप्त करने की विद्या कह सकते हैं और आध्यात्मिक रूप से इसे मोक्ष प्राप्त करने की अत्यन्त प्राचीन परम्परा कहा जा सकता है। शब्दकोशों के अनुसार श्री के कई अर्थ हैं- लक्ष्मी, सरस्वती, ब्रह्मा, विष्णु, कुबेर, त्रिवर्ग(धर्म-अर्थ व काम), सम्पत्ति, ऐश्वर्य, कान्ति, बुद्धि, सिद्धि, कीर्ति, श्रेष्ठता आदि। इससे भी श्रीविद्या की महत्ता ज्ञात हो जाती है। राजराजेश्वरी भगवती ललिता की आराधना को सम्पूर्ण भारत में एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। जगद्गुरु श्री शंकराचार्य के चारों मठों में ( 1 . गुजरात के द्वारका में, 2. उत्तराखंड के जोशीमठ में स्थित शारदा पीठ, 3. कर्नाटक के श्रृंगेरी पीठ व 4. उड़ीसा के पुरी में) इन्ह...


भगवान हयग्रीव की आराधना दिलाती है वांछित फल

भ गवान हयग्रीव अथवा हयशीर्ष भगवान विष्णु जी के ही अवतार हैं... इनका सिर घोड़े का है। पुराणों में भगवान के इस स्वरूप से संबन्धित कथाएँ मिलती हैं।  कल्प भेद हरि चरित सुहाए  - तुलसीदास जी के अनुसार हर कल्प में भगवान भिन्न-भिन्न प्रकार से सुहावनी लीला रचते हैं। सृष्टि के आदिकाल में क्षीरोदधि में अनन्त-शायी प्रभु नारायण की नाभि से पद्म प्रकट हुआ। पद्म-की कर्णिका से सिन्दूरारुण चतुर्मुख लोकस्रष्टा ब्रह्माजी व्यक्त हुए। क्षीरोदधि से दो बिन्दु निकलकर कमल पऱ पहुँच गये।


श्री कल्कि अवतार-धारी भगवान की अधर्मनाशक आराधना

हि न्दू   धर्मग्रंथों के अनुसार ,   सतयुग , द्वापर ,   त्रेतायुग   बीतने के बाद   यह   वर्तमान युग   कलियुग   है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए कथन के अनुसार-   जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है , तब तब श्रीहरि स्वयं की सृष्टि करते हैं , अर्थात् भगवान्   अवतार ग्रहण करते हैं। साधु-सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए श्रीकृष्ण विभिन्न युगों में अवतरित होते हैं और आगे भी होते रहेंगे- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌। धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥       कल्कि पुराण में वर्णन है कि चौथे चरण में कलियुग जब अपनी चरम सीमा तक   पहुँच जाएगा , तब अपराध-पाप-अनाचार अत्यन्त   बढ़ जायेंगे ; अधर्म-लूटपाट-हत्या तो सामान्य बात हो   जायेगी यहाँ तक कि लोग   ईश्वर-सत्कर्म-धर्म सब   भूल   जायेंगे।   तब   भगवान श्रीहरि अ...


विश्व-संस्कृति के रक्षक व प्रतिष्ठापक श्री मत्स्य भगवान की जयन्ती

भ गवान  श्रीहरि के चौबीस प्रमुख अवतार हैं, उन अवतारों की प्रादुर्भाव(जयन्ती) तिथि पर भक्तजन उत्सव किया करते हैं।   अवतारों की जयंती तिथियों पर श्रद्धालुगण उन अवतारों की विविध प्रकार से आराधना किया करते हैं।  पुराणों के अनुसार लीलाविहारी  परमकृपालु  भगवान् नारायण धर्म की संस्थापना के लिए समय-समय पर विविध अवतार लिया करते हैं।   चैत्र शुक्ल तृतीया श्रीमत्स्य भगवान की जयंती तिथि है।


योग्य अधिकारी को दर्शन देते हैं भगवान परशुराम

भ गवान् परशुराम स्वयं भगवान् विष्णु के अंशावतार हैं। इनकी गणना दशावतारों में होती है। जब वैशाखमास के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र मेँ रात्रि के प्रथम प्रहर में उच्च के छ: ग्रहों से युक्त मिथुन राशि पर राहु स्थित था, तब उस योग में माता रेणुका के गर्भ से भगवान् परशुराम का प्रादुर्भाव हुआ - वैशाखस्य सिते पक्षे तृतीयायां पुनर्वसौ। निशाया: प्रथमे यामे रामाख्य: समये हरि:॥ स्वोच्चगै: षड्ग्रहैर्युक्ते मिथुने राहुसंस्थिते। रेणुकायास्तु यो गर्भादवतीर्णो विभु: स्वयम्॥


तारा महाविद्या करती हैं भयंकर विपत्तियों से भक्तों की रक्षा

भ गवती आद्याशक्ति के दशमहाविद्यात्मक दस स्वरूपों में एक स्वरूप भगवती तारा का है।   क्रोधरात्रि में भगवती तारा का प्रादुर्भाव हुआ था । चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को महाविद्या तारा की जयन्ती तिथि बतलाई गई है। महाविद्या काली को ही नीलरूपा होने के कारण तारा भी कहा गया है। वचनान्तर से तारा नाम का रहस्य यह भी है कि ये सर्वदा मोक्ष देने वाली, तारने वाली हैं इसलिये इन्हें तारा कहा जाता है-  तारकत्वात् सदा तारा सुख-मोक्ष-प्रदायि नी।  महाविद्याओं के क्रम में ये द्वितीय स्थान पर परिगणित की जाती हैं।  रात्रिदेवी की स्वरूपा शक्ति  भगवती  तारा दसों  महाविद्याओं में  अद्भुत प्रभाववाली और  सिद्धि की अधिष्ठात्री देवी  कही गयी हैं। भगवती तारा के तीन रूप हैं-  तारा, एकजटा और नीलसरस्वती।  श्री तारा महाविद्या के  इन   तीनों रूपों के रहस्य, कार्य-कलाप तथा ध्यान परस्पर भिन्न हैं किन्तु भिन्न होते  हुए भी सबकी शक्ति समान और एक ही है।   1. नीलसरस्वती अनायास ही वाक्शक्ति प्रदान करने में समर्थ हैं, इसलिये...


श्री रामनवमी विशेष-पापनाशक श्री सीता-राम जी की आराधना दिलाती है मुक्ति

भ गवान श्रीराम की जयंती तिथि श्रीरामनवमी सारे जगत के लिये सौभाग्य का दिन है; क्योंकि अखिल विश्वपति सच्चिदानन्दघन श्रीभगवान् इसी दिन दुर्दान्त रावण के अत्याचार से पीड़ित पृथ्वी को सुखी करने और सनातन धर्म की मर्यादा को स्थापित करने के लिये श्रीरामचन्द्रजी के रूपमें प्रकट हुए थे। श्री राम सबके हैं, सबमें हैं, सबके साथ सदा संयुक्त हैं और सर्वमय हैं। जो कोई भी जीव उनकी आदर्श मर्यादा-लीला-उनके पुण्यचरित्र का श्रद्धापूर्वक गान, श्रवण और अनुकरण करता है, वह पवित्रहृदय होकर परम सुख को प्राप्त कर सकता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को ' श्रीरामनवमी ' का व्रत होता है।


सारस्वतोत्सव पर जानिये सरस्वती जी की महिमा

भ गवती शारदा विद्या, बुद्धि, ज्ञान एवं वाणी की अधिष्ठात्री तथा सर्वदा शास्त्र-ज्ञान देने वाली देवी हैं। हमारे हिन्दू धर्मग्रन्थों में इन्हीं माँ वागीश्वरी की जयंती वसन्त पञ्चमी के दिन बतलाई गई है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी को मनाया जाने वाला यह सारस्वतोत्सव या सरस्वती-पूजन अनुपम महत्त्व रखता है। सरस्वती माँ का मूलस्थान शशाङ्क-सदन अर्थात् अमृतमय प्रकाश-पुञ्ज है। जहां से वे अपने उपासकों के लिये निरंतर पचास अक्षरों के रूप में ज्ञानामृत की धारा प्रवाहित करती हैं। शुद्ध ज्ञानमय व आनन्दमय विग्रह वाली माँ वागीश्वरी का तेज दिव्य व अपरिमेय है और इनकी ही शब्दब्रह्म के रूप में स्तुति की जाती हैं। सृष्टिकाल में ईश्वर की इच्छा से आद्याशक्ति ने स्वयं को पाँच भागों में विभक्त किया था। वे राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा एवं सरस्वती के रूप में भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न अंगों से उत्पन्न हुईं थीं। उस समय श्रीकृष्ण के  कण्ठ से उत्पन्न होने वाली देवी का नाम सरस्वती हुआ। ये नीलसरस्वती-रूपिणी देवी ही तारा महाविद्या हैं।


महाकाली महिमा तथा काली एकाक्षरी मन्त्र पुरश्चरण

का ल अर्थात् समय/मृत्यु की अधिष्ठात्री भगवती महाकाली हैं। यूं तो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की रात्रि योगमाया भगवती आद्याकाली के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। परंतु तान्त्रिक मतानुसार आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन ' काली जयंती ' बतलायी गयी है। जगत के कल्याण के लिये वे सर्वदेवमयी आद्या शक्ति अनेकों बार प्रादुर्भूत होती हैं, सर्वशक्ति संपन्न वे भगवान तो अनादि हैं परंतु फिर भी भगवान के अंश विशेष के प्राकट्य दिवस पर उन स्वरूपों का स्मरण-पूजन कर यथासंभव उत्सव करना मंगलकारी होता है। दस महाविद्याओं में प्रथम एवं मुख्य महाविद्या हैं भगवती महाकाली। इन्हीं के उग्र और सौम्य दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविद्याएँ हैं। विद्यापति भगवान शिव की शक्तियां ये महाविद्याएँ अनन्त सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दार्शनिक दृष्टि से  भी कालतत्व की प्रधानता सर्वोपरि है। इसलिये महाकाली या काली ही समस्त विद्याओं की आदि हैं अर्थात् उनकी विद्यामय विभूतियाँ ही महाविद्याएँ हैं। ऐसा लगता है कि महाकाल की प्रियतमा काली ही अपने दक्षिण और वाम रूपों में दस महाविद्याओं के नाम से विख्य...


वामन जयंती पर जानिये भगवान वामन के अवतार की कथा

आ ज यानि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की  द्वादशी तिथि को ही भगवान श्री हरि ने वामन अवतार धारण किया था। प्रह्लाद के पुत्र विरोचन से महाबाहु बलि का जन्म हुआ। दैत्यराज बलि धर्मज्ञों में श्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, बलवान, नित्य धर्मपरायण, पवित्र और श्रीहरि के प्रिय भक्त थे।  यही कारण था कि उन्होंने इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं और मरुद्गणों को जीतकर तीनों लोकों को अपने अधीन कर लिया था। इस प्रकार राजा बलि समस्त त्रिलोकी पर राज्य करते थे। इंद्रादिक देवता दासभाव से उनकी सेवा में खड़े रहते थे। परम भक्त तो थे राजा बलि किन्तु बलि को अपने बल का अभिमान था। इन्द्र आदि देवों का अधिपत्य हड़प चुके थे वो। कितना ही बड़ा भक्त हो कोई अभिमान आ जाय तो सारी भक्ति व्यर्थ है। तब महर्षि कश्यप ने अपने पुत्र इन्द्र को राज्य से वंचित देखकर तप किया और भगवान विष्णु से बलि को मायापूर्वक परास्त करके इन्द्र को त्रिलोकी का राज्य प्रदान करने का वरदान माँगा।


भुवनेश्वरी महाविद्या हैं सर्वस्वरूपा मूल प्रकृति (भुवनेश्वरी खड्गमाला स्तोत्र)

माँ भुवनेश्वरी की आराधना हेतु सर्वोत्तम दिवस है भुवनेश्वरी महाविद्या की जयंती तिथि । दस महाविद्याओं में से पंचम महाविद्या भगवती भुवनेश्वरी का भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को प्रादुर्भाव हुआ माना जाता है। भुवनेश्वरी महाविद्या का स्वरूप सौम्य है और इनकी अंगकान्ति अरुण है। भक्तों को अभय और समस्त सिद्धियाँ प्रदान करना इनका स्वाभाविक गुण है। वास्तव में मूल प्रकृति का ही दूसरा नाम भुवनेश्वरी है। दशमहाविद्याएँ ही दस सोपान हैं । काली तत्व से निर्गत होकर कमला तत्व तक की दस स्थितियाँ हैं , जिनसे अव्यक्त भुवनेश्वरी व्यक्त होकर ब्रह्माण्ड का रूप धारण कर सकती हैं तथा प्रलय में कमला से अर्थात् व्यक्त जगत से क्रमशः लय होकर कालीरूप में मूलप्रकृति बन जाती हैं । इसीलिये भगवती भुवनेश्वरी को काल की जन्मदात्री भी कहा जाता है ।


श्रीराधा हैं युगल सरकार स्वरूपिणी भगवती - राधाष्टमी विशेष

भ गवती महालक्ष्मी स्वरू पा भगवती श्रीराधा, श्रीकृष्ण की ही भाँति नित्य-सच्चिदानन्दघन रूपा हैं। समय-समय पर लीला के लिये प्रकट होने वाले भगवान श्रीकृष्ण की ही भाँति ये भी आविर्भूत हुआ करती हैं। एक बार ये दिव्य गोलोकधाम में श्रीकृष्ण के वामांश से प्रकट हुई थीं। इन्होंने ही फिर व्रजभूमि के अन्तर्गत बरसाने [वृषभानुपुर]में भाद्रपद शुक्ला अष्टमी को श्री वृषभानु महाराज के घर परमपुण्यमयी श्रीकीर्तिदारानी जी की कोख से प्रकट होने की लीला की थी। आज उसी का महोत्सव राधाष्टमी के रूप में मनाया जाता है।


दशाफल व्रत एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत का महत्व [मधुराष्टकम्]

म हापुण्यप्रद पंच महाव्रतों में से एक है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत । अर्धरात्रिकालीन अष्टमी में रोहिणी नक्षत्र व बुधवार से बना श्री कृष्ण जयंती का योग   महापुण्यप्रद  हो जाता है; साथ ही हर्षण योग, वृषभ लग्न और उच्च राशि का चंद्रमा, सिंह राशि का सूर्य हो तो ऐसे दुर्लभ योग में ही प्रभु श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था । इस दिन अर्धरात्रि में आद्याकाली जयंती भी होती है। अष्टमी को यदि बुधवार आ जाय तो बुधाष्टमी का शुभप्रद व्रत भी सम्पन्न हो जाता है, जो कि सूर्यग्रहण के तुल्य होता है।  मोहरात्रि व गोकुलाष्टमी इस दिन के ही दूसरे नाम हैं। इस दिन दशाफलव्रत  किया जाता है तथा मार्गशीर्ष से शुरू किया गया कालाष्टमी व्रत  हर महीने के कृष्ण पक्ष की तरह इस दिन भी किया जाता है। कौन नहीं जानता भगवान श्रीकृष्ण को? भागवत में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत लीलाओं को एक बार भी सुनकर-पढ़कर भला उन राधामाधव को कौन भूल सकता है? वही ये लीलाविहारी श्रीकृष्ण हैं जिन्होंने बचपन में ही खेल-खेल में नृत्य करते हुए सात फन वाले भयानक  कालिय नाग का मर्दन  कर ड...


गुप्त नवरात्रि का महत्व [श्री दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला]

आ षाढ़ व माघ मास के शुक्ल पक्ष से गुप्त नवरात्रियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं। यूं तो प्रत्येक मास के किसी भी पक्ष की प्रतिपदा तिथि से लेकर नवमी तिथि तक के समय को नवरात्र   कहा जा सकता है परंतु इनमें से चार ही नवरात्रियां श्रेष्ठ हैं। इस प्रकार हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथों में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ इन चार हिन्दू महीनों में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक का समय बड़े महत्व का बताया गया है । इनमें से चैत्र मास की नवरात्रि को वासंतिक नवरात्रि , आश्विन मास की नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि और आषाढ़ व माघ मास की नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि यों की संज्ञा दी गयी है। वासंतिक व शारदीय नवरात्रि तो विश्वप्रसिद्ध हैं पर गुप्त नवरात्रि नाम के ही अनुसार गुप्त हैं अर्थात् बहुत कम लोग इनके विषय में जानकारी रखते हैं। इसके साथ ही दूसरी बात यह ध्यातव्य है कि  देवी के पूजक आराधक चैत्र व आश्विन नवरात्र में तो प्रकट रूप से उपासना करते हैं। अर्थात बड़े ही  धूमधाम से उत्सव मनाते हुए नौ दिन उपवास और चण्डी पाठ विस्तार से करके कन्या पूजन सहित विधि विधान से सभी अनुष्ठान करते हैं। ले...


गंगा दशहरा व्रत विधि व पापनाशिनी गंगा जी की महिमा [गंगा दशहरा स्तोत्रम्]

भ द्रजनों,  धूंकाररूपिणी महाविद्या धूमावती जी की जयंती  के अगले दिन से प्रारम्भ होता है दस दिनात्मक गंगा दशहरा का पावन पर्व। धूर्जटी शिव शंकर की जटा से निकलने वाली माँ गंगा, जिनका जल जिस स्थान से होकर गया वे पवित्र तीर्थ बन गए।  हमारे हिन्दू धर्म ग्रन्थों में गौ, गंगा एवं गायत्री इन तीनों को पापनाशक त्रिवेणी बतलाया गया है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन कलिमल का दहन करने में सक्षम गंगाजी अवतरण हुआ था अतः इस इस अवसर पर  गंगास्नान का विशेष महत्व   बताया गया है।  आइये पहले माँ गंगा के स्वरूप का चिंतन करते हैं। माँ गंगा जी का ध्यान इस प्रकार है- सितमकर-निषण्णां शुक्लवर्णां त्रिनेत्राम् करधृत-कमलो-द्यत्सूत्पलाऽभीत्यभीष्टाम् । विधिहरिहर-रूपां सेन्दु-कोटीरचूडाम् कलितसितदुकूलां जाह्नवीं तां नमामि ॥ अर्थात्  श्वेत मकर पर विराजित, शुभ्र वर्ण वाली, तीन नेत्रों वाली, दो हाथों में भरे हुए कलश तथा दो हाथों में सुंदर कमल धारण किए हुए, भक्तों के लिए परम इष्ट, ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तीनों का रूप अर्थात् तीनों के कार्य करने वाली,...


शनिदेव हैं सूर्यपुत्र तथा दंडाधिकारी [दशरथ कृत शनि स्तोत्र]

ह मारे हिंदू धर्मग्रन्थों में ज्येष्ठ मास की प्रतिपदा तिथि को   नारद जी की जयंती कहा गया है तथा ज्येष्ठ मास की अमावास्या को  'शनि जयंती'  बतलाई गई है। ध्यातव्य है कि कुंडली में कई योग ऐसे हैं जिनमें शनि ग्रह की क्रूर दृष्टि से जातक को पीड़ा मिलती है इसीलिए बहुत से लोग शनिदेव को क्रूर ग्रह मानते हैं पर वास्तव में शनि तो प्रारब्ध के बुरे कर्मों का फल ही देते हैं और अंत में जातक को धार्मिक भी बना देते हैं; और हमारे शास्त्रों में कहा भी गया है कि कोई भी ग्रह यदि बुरे प्रभाव दे या पीड़ा दे तो उसकी उपेक्षा मत कीजिये क्योंकि इससे तो और अधिक बुरे परिणाम मिलेंगे। बल्कि हमें उन ग्रहों को पूजना चाहिए। उनके निमित्त जपदान किया जाना चाहिए इससे उन ग्रहों द्वारा कुंडली में उत्पन्न अशुभता में कमी आती है।   स्वयं महादेव ने शनिदेव को बुरे कर्म करने वालों को दंड देने का अधिकार दिया था ।  ज्येष्ठी अमावास्या को दंडाधिकारी शनिदेव की जयंती कही गयी है।  उस पर भी शनैश्चरी अमावास्या पर शनि देव की स्तुति करने का बड़ा ही महत्व है। शनैः चरति ...


श्री कूर्म अवतार श्रीहरि नारायण के प्रादुर्भाव की कथा

ज यन्ती तिथियों का हमारे हिन्दू धर्म में बहुत महत्व रहा है। श्री नृसिंह जी, छिन्नमस्ता जी और शरभ जी की प्रादुर्भाव तिथि के अगले दिन होती है श्री कूर्म अवतार जयंती। कूर्म को कच्छप या कछुआ भी कहा जाता है। वैशाख मास की पूर्णिमा को समुद्र के अंदर सायंकाल में विष्णु भगवान ने कूर्म [कछुए] का  अवतार लिया था। पूर्वकाल में अमृत प्रात करने हेतु देवताओं ने दैत्यों और दानवों के साथ मिलकर मन्दराचल पर्वत को मथानी बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया था। उस मंथनकाल में इन्हीं  कूर्मरूपधारी जनार्दन विष्णु जी ने देवताओं के कल्याण की कामना से मन्दराचल को अपनी पीठ पर धारण किया था। भगवान कूर्म


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