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⭐ २५ जुलाई से २१ नवंबर २०२६ तक चातुर्मास व्रत

चार महीने के इस चातुर्मास्य व्रत के अंतर्गत इच्छुक व्रती नियमों का पालन करें:

  • शाक (सब्जी) का त्याग: आषाढ़ शुक्ल एकादशी (25 जुलाई 2026) से श्रावण शुक्ल द्वादशी (24 अगस्त 2026) तक शाक-सब्जी का त्याग करें (या किसी एक प्रकार की शाक का सेवन न करें)।
  • दही का त्याग: श्रावण शुक्ल द्वादशी (24 अगस्त) को त्यागी गई सब्जियों का दान देकर, 24 अगस्त से भाद्रपद शुक्ल द्वादशी (23 सितम्बर) तक दही का त्याग करें। (नोट: तक्र या मट्ठा निषेध नहीं है)।
  • दूध का त्याग: भाद्रपद शुक्ल द्वादशी (23 सितम्बर) को दही का दान करके, 23 सितम्बर से आश्विन शुक्ल द्वादशी (23 अक्टूबर) तक दूध का त्याग करें।
  • दालों का त्याग: आश्विन शुक्ल द्वादशी (23 अक्टूबर) को दूध का दान करके, 23 अक्टूबर से कार्तिक शुक्ल एकादशी (21 नवंबर) तक दालों (या किसी एक प्रकार की दाल) का त्याग करें।
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होरा चक्र क्या है? जानें होरा का शास्त्रीय आधार और दैनिक जीवन में इसका उपयोग

जी वन में हम कई बार पूरी मेहनत और उत्तम उद्देश्य से काम शुरू करते हैं, लेकिन फिर भी मनचाही सफलता नहीं मिलती। सनातन संस्कृति और वैदिक ज्योतिष में इसका प्रमुख कारण 'सही समय का चयन न होना' माना गया है। शास्त्रों में किसी भी कार्य को सिद्ध और निष्फल होने से बचाने के लिए 'होरा चक्र' (Planetary Hours) का विशेष महत्व बताया गया है। आइए जानते हैं कि होरा क्या है, इसका शास्त्रीय आधार क्या है, इसके सूक्ष्म नियम क्या हैं और आप होरा के सही उपयोग से अपने दैनिक जीवन को कैसे सफल बना सकते हैं? होरा क्या है? (What is Hora in Astrology?) सरल शब्दों में, सूर्योदय से लेकर अगले सूर्योदय तक के 24 घंटों के समय को 24 बराबर भागों में बांटा गया है। इसके एक भाग (लगभग एक घंटे) को 'होरा' कहते हैं। प्रत्येक घंटे (होरा) पर सौरमंडल के सात मुख्य ग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) में से किसी एक ग्रह का आधिपत्य यानी शासन होता है। बृहत् पर...


नागों की स्तोत्रात्मक उपासना : सर्पभय - सर्प दोष निवारण

ह मारी सनातन परंपरा में नाग केवल भय और रहस्य के प्रतीक नहीं, बल्कि पूज्य देवशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। वेदों से लेकर पुराणों तक, नागों को सृष्टि की रक्षक शक्तियों में गिना गया है — शेषनाग जिन पर स्वयं भगवान विष्णु शयन करते हैं, वासुकि जिन्होंने समुद्र-मंथन में रस्सी का कार्य किया और तक्षक जैसे नाग जिनका उल्लेख महाभारत में मिलता है। इसी आस्था की परिणति है नागपंचमी का पर्व, जब श्रद्धालु नाग देवताओं की स्तुति कर उनसे सुख-समृद्धि और विष-भय से रक्षा की कामना करते हैं। नागवासुकि मंदिर, प्रयागराज


ग्रहण में मन्त्र पुरश्चरण का विधान

भौ गोलिक व वैज्ञानिक दृष्टि के अलावा ग्रहण का धार्मिक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्व है। ग्रहण काल में मंत्र जप, स्तोत्र पाठ एवं दान देने का अनंत गुना महत्त्व है।  ग्रहण के मोक्ष के उपरांत अपनी क्षमता के अनुसार अवश्य दान दें। महाभारत के दानधर्म पर्व के 145 अध्याय के अनुसार शिव जी पार्वती जी से कहते हैं कि - शरद व वसंत ऋतु, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा, मघा नक्षत्र, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण - ये सब अत्यन्त शुभकारक काल हैं। 1.दाता हो, 2.देने की वस्तु हो, 3.दान लेने वाला पात्र हो, 4.उत्तम व्यवस्था हो और 5.उत्तम देश, 6. उत्तम काल हो- इन सबका सम्पन्न होना शुद्धि कही गयी है। जब कभी इन सबका संयोग जुट जाये, तभी दान देना महान फलदायक होता है। इन छः गुणों से युक्त जो दान है, वह अत्यन्त अल्प होने पर भी उस का प्रभाव अनन्त होकर निर्दोष दाता को मरणोपरान्त स्वर्ग की प्राप्ति करवाता है।  चंद्र ग्रहण ग्रहण की अवधि में मंत्र का जप करने से मंत्र का पुरश्चरण करने के समान ही फल होता है। जो बहुत अधिक मंत्र जप नहीं कर सकते हैं उनके लिये यह विधि सबसे सरल है।  गुरु से प्राप्त किए गए मंत्र का ग्रहण ...


कमला महाविद्या की स्तोत्रात्मक उपासना

भ गवती  कमला  दस महाविद्याओं में दसवें स्थान पर आती है। यही श्री हरि की प्रिया महालक्ष्मी हैं। कमला महाविद्या को जगत्प्रसूता कहा गया है। जगत्प्रसूता अर्थात् संसार को उत्पन्न करने वाली। दुर्गासप्तशती के रहस्य में भी कहा गया है कि सृष्टि के आदि में भगवती महालक्ष्मी ही थीं उन्हीं से समस्त देवी देवता तथा संसार उत्पन्न हुआ।दीपावली पर हर सनातनी सुंदर प्रकार से माँ लक्ष्मी की पूजा कर के मनोवांछित फल पाता है। वैकुण्ठ-वासिनी देवी 'कमला' हैं। वे ही पाताल-वासिनी होकर 'लक्ष्मी' रूपा सुन्दरी हो जाती हैं।भगवती कमला की कृपा से धन धान्य की कमी नहीं रहती, रोग मुक्ति, कष्टों का अंत, पापों का क्षय व जीवनोपरान्त मोक्ष प्राप्त होता है।


भगवान धन्वन्तरि की स्तोत्रात्मक उपासना

उ त्तम स्वास्थ्य की आवश्यकता किसे नहीं होती?  प्रत्येक व्यक्ति स्वस्थ शरीर, शांत मन और दीर्घ आयु की कामना करता ही है। परन्तु क्या आपने कभी सोचा है कि स्वास्थ्य मात्र आधुनिक चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि यह एक दैविक वरदान भी है?  हमारे सनातन धर्म में ऐसे एक दिव्य देवता हैं  भगवान श्री धन्वंतरि  जी जिनके चरणों से ही आयुर्वेद का प्रादुर्भाव हुआ। पुरातन काल में जब समुद्र मंथन हुआ था, तब अमृत कलश लेकर श्री हरि विष्णु जी ही श्री धन्वन्तरि भगवान् के रूप में प्रकट हुए थे।  तभी से मानव जीवन के लिए स्वास्थ्य, औषधि व आयुर्विज्ञान का आधार स्थिर हुआ। आज जब मानव आधुनिक चिकित्सा पर निर्भर होते हुए भी भीतर से असंतुष्ट और रोगग्रस्त है, ऐसे में एक प्रश्न उठता है कि  क्या हमें फिर से भगवान धन्वंतरि के सिद्धांतों की ओर, आयुर्वेद की ओर लौटना चाहिये? भगवान  धन्वन्तरि ने तीन नाम रूपी मंत्र दिये हैं जिनका उच्चारण करने से सभी रोग सभी उत्पात दूर होते हैं - अच्युत   , अनन्त, गोविन्द | धनत्रयोदशी अर्थात् कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को इनकी ही आराधना की जाती है।  धन्व...


श्री काली ककारादि सहस्रनाम स्तोत्र

भ गवान महाकाल की अभिन्न शक्ति हैं महाकाली। उपासकों के कल्याण के लिये भगवती पार्वती के दो रूप हो गये लालिमा लिया हुआ रूप भगवती त्रिपुर सुंदरी का है, और कृष्ण वर्ण का रूप भगवती काली का है। सभी देवियों में एकत्व है। देवी के सभी रूपों में अभेद रहता है। पूजा - अर्चना करने से व मंत्र जाप द्वारा मां काली की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। मंत्र द्वारा भगवती काली की उपासना करने के लिये मंत्र दीक्षा की आवश्यकता होती है। लेकिन सामान्य आराधकों को, अदीक्षितों को स्तोत्रों का ही पाठ करना चाहिये।  यूं तो भगवती महाकाली को प्रसन्नता देने वाले बहुत से स्तोत्र हैं, परन्तु श्री काली सहस्रनाम स्तोत्र का महत्व इन सबमें श्रेष्ठ है। दीक्षित साधक भी पूर्णता हेतु अपनी साधना में सहस्रनाम स्तोत्र पढ़ते ही हैं। सहस्रनाम या शतनाम स्तोत्राें के माध्यम से सरलता पूर्वक साधना हो जाती है। इसमें नाम रूपी मंत्रों का जप तो चलता ही है; साथ ही एक ही देव के विभिन्न नामों को पढ़ते—पढ़ते मन में उन नामों का अर्थ चिंतन होने से उस देवता के स्वरूप गुण के विषय में कई भाव प्रकट होते हैं, देवता के बारे में कई विशिष्ट बातें ...


तारा महाविद्या की स्तोत्रात्मक उपासना

श्री रामनवमी के दिन अर्थात चैत्र शुक्ल नवमी को होती है भगवती तारा की जयंती । जिस प्रकार प्रभु श्रीराम जी का नाम ही भवबंधन से तार देता है उसी प्रकार भगवती तारा नामानुरूप ही जीव को तारकर जीवन्मुक्त बना देती हैं।   'कुब्जिका तन्त्र' के प्रथम पटल के अनुसार कलिकाल में ये देवी कृष्णत्व को पाकर शुक्लवर्णा होती हुई भी सहज नीलरूपिणी होकर वाक् शक्ति प्रदान करती हैं , अतः इनका ' नील सरस्वती ' नाम पड़ा है। तारने तथा मुक्ति देने के कारण इनको 'तारा' और 'तारिणी' कहते हैं। वैसे तो किसी भी महाविद्या की आराधना करो मोक्ष प्राप्त होता ही है। परन्तु तारा महाविद्या के तो नाम में ही मोक्ष छिपा हुआ है। कहते हैं महाविद्या में, देवियों में भेद न करे। काली तन्त्र में लिखा भी है- यथा काली तथा तारा छिन्ना च। या काली परमा विद्या सैव तारा प्रकीर्तिता एतयोर्भेद भावेन सिद्धिहानिस्तु जायते। अर्थात् जो काली महाविद्या हैं वही तारा महाविद्या तथा छिन्नमस्ता महाविद्या हैं। इनमें भेद भाव करने से सिद्धि की हानि होती है। महाविद्याओं की आराधना में स्तोत्र पाठ का विशेष स्थान है।  तारा मह...


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