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ह मारी सनातन परंपरा में नाग केवल भय और रहस्य के प्रतीक नहीं, बल्कि पूज्य देवशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। वेदों से लेकर पुराणों तक, नागों को सृष्टि की रक्षक शक्तियों में गिना गया है — शेषनाग जिन पर स्वयं भगवान विष्णु शयन करते हैं, वासुकि जिन्होंने समुद्र-मंथन में रस्सी का कार्य किया और तक्षक जैसे नाग जिनका उल्लेख महाभारत में मिलता है। इसी आस्था की परिणति है नागपंचमी का पर्व, जब श्रद्धालु नाग देवताओं की स्तुति कर उनसे सुख-समृद्धि और विषभय से रक्षा की कामना करते हैं। नाग-उपासना के हेतु संस्कृत साहित्य में अनेक स्तोत्रों की रचना हुई है जो नागों की महिमा, उनके गुण और उनकी दिव्यता का वर्णन करते हैं। इन स्तोत्रों का पाठ आज भी भारत के विभिन्न प्रांतों में श्रद्धापूर्वक किया जाता है। यहाँ नाग-स्तोत्रों और उनके महत्व व नागपंचमी के अवसर पर उनकी उपासना-विधि प्रस्तुत हें। ज्योतिष शास्त्र और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इन स्तोत्रो का पाठ नाग देवताओं के आशीर्वाद, मनोकामना पूर्ति, कालसर्प दोष व राहु-केतु से जुड़े प्रतिकूल प्रभावों की शांति और सुरक्षा के लिए किया जाता है। ॥नाग कवच स्तोत...