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वासन्तीय या चैत्र नवरात्रों का महत्व

व सन्त ऋतु के आगमन के पश्चात एक के  बा द एक  व्रतोत्सव-पर्व- त्यौहारों के आने का क्रम प्रारम्भ होने लगता है ।   वसन्त  ऋतु   में  सभी के हृदय में रस का  संचा र होता है ,  सभी  उमंग से  भरे रहते हैं  इसी कारण  देव-देवी की पूजा इत्यादि में वे प्रसन्न रहते हैं।  साथ ही  बुरे कर्मों  को करने की प्रवृत्ति  से नर और नारी  को  बचाने के लिए  भी इन उत्सवों का प्रयोजन है।  वै शाख का पूरा महीना कुमारी  क न्याओं के लिए व्रत करने का  समय  है। कन्याएँ ठीक पथ पर र हें ,  इसलिए वैशाख के महीने में उनकी माँ ,  दादी इत्यादि व्रत करवाती हैं।  किसी मत से  फा ल्गु न और  चै त्र  मास में  वसन्त-ऋतु  मानी जाती  है और किसी के मत से  चै त्र और  वैशाख   मास में।  वै शाख का दूसरा नाम  ' माधव '  है और  चैत्र मास  का  ‘ मधु ’  नाम है।  हिंदू धर्म के प्रति आस्थावान श्रद्धालुगण वसन्त ऋतु में मधु मा...


नवरात्र दुर्गा पूजा विधि: घर पर आसानी से ऐसे करें माँ दुर्गा की पूजा (सम्पूर्ण विधान)

भ वसागर से तारने वाली, परम दयालु, कष्टहारिणी, कृपाकारिणी श्री  दुर्गा जी की  नवरात्रि में शुक्ल प्रतिपदा के  दिन , अष्टमी को महापूजा में, जहाँ अष्टमी-नवमी तिथि मिलते हैं अर्थात् सन्धिपूजा में, प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को दुर्गा जी की उत्तम प्रकार से पूजा करनी चाहिये। अतएव नवरात्र या अन्य दिनों में भी जो श्री दुर्गा की  शास्त्रोक्त पूजा की जाती है उसका विधान यहाँ प्रामाणिक व शुद्ध रूप में प्रस्तुत है।  श्री दुर्गा पूजा आवश्यक सामग्री (Durga Puja Samagri List) 1. प्राथमिक सामग्री (Basic Setup) माँ दुर्गा की मूर्ति या चित्र पूजा की चौकी और लाल या पीला सूती कपड़ा दीपक (पीतल या मिट्टी का) और गाय का शुद्ध घी / तिल का तेल रुई की बत्तियाँ और माचिस 2. अभिषेक एवं स्नान सामग्री शुद्ध जल एवं गंगाजल पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी) इत्र (सुगंधित द्रव्य) 3. पूजन एवं अर्पण सामग्री रोली, हल्दी, चंदन / रक्त चंदन), अबीर-गुलाल अक्षत (अखंडित चावल) मौली (कलावा) लाल प...


सिद्धि-प्रदा सिद्धिदात्री जी की महिमा - नवरात्र का नवम दिन

माँ सिद्धिदात्री   दुर्गाजी की  नवीं शक्ति हैं। माता सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। मार्कण्डेयपुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व - ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के अध्याय छः में महादेव शिव जी द्वारा सिद्धियों की संख्या अट्ठारह बतायी गयी है। इन अट्ठारह तरह की सिद्धियों के नाम इस प्रकार कहे जाते हैं-       १- अणिमा , २- लघिमा , ३- प्राप्ति , ४- प्राकाम्य, ५- महिमा , ६- ईशित्व और वशित्व , ७- सर्वकामावसायिता , ८- सर्वज्ञत्व , ९- दूरश्रवण , १०- परकायप्रवेशन , ११- वाक्सिद्धि , १२- कल्पवृक्षत्व , १३- सृष्टि , १४- संहारकरणसामर्थ्य , १५- अमरत्व , १६- सर्वन्यायकत्व , १७- भावना और १८- सिद्धि ।


महागौरी जी की महिमा - नवरात्र का आठवां दिन महाष्टमी

म हागौरी माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति हैं। हिंदू धर्म-ग्रन्थों के अनुसार माता महागौरी का वर्ण पूर्णतः गौर है। महागौरी माता की इस गौरता की उपमा शङ्ख, चन्द्र और कुन्द के फूल से दी गयी है। ' अष्टवर्षा भवेद् गौरी ' के अनुसार  महागौरी भगवती की आयु सर्वदा आठ वर्ष  की ही मानी गयी है। महागौरी जी के समस्त वस्त्र एवं आभूषण भी श्वेत हैं। देवी महागौरी की चार भुजाएँ हैं। महागौरी माँ का वाहन वृषभ है। महागौरी जी के ऊपर के दाहिने हाथ में अभय-मुद्रा और नीचे के बायें हाथ में वर-मुद्रा है। महागौरी माता की मुद्रा अत्यन्त शान्त है।


शुभङ्करी कालरात्रि माता की महिमा - नवरात्र का सप्तम दिन

का लरात्रि माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति हैं जो नवरात्र की सप्तमी तिथि को पूजी जाती हैं। हिंदू धर्म-ग्रन्थों के अनुसार माता कालरात्रि के शरीर का रंग घने अन्धकार की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। ये तीनों नेत्र ब्रह्माण्ड के सदृश गोल हैं। कालरात्रि जी से विद्युत के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं। इनकी नासिका के श्वास-प्रश्वास से अग्नि की भयङ्कर ज्वालाएँ निकलती रहती हैं। माँ कालरात्रि का वाहन गर्दभ है। कालरात्रि माँ के ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वरमुद्रा सभी को वर प्रदान करती है। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा तथा नीचे वाले हाथ में हाथ में खड्ग (कटार) है-  एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त-शरीरिणी॥ वामपादोल्लसल्लोह-लताकण्टक-भूषणा। वर्धनमूर्ध-ध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥ अर्थात् एक वेणी (बालों की चोटी) वाली, जपाकुसुम (अड़हुल) के फूल की तरह लाल कर्ण वाली, उपासक की कामनाओं को पूर्ण ...


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