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कमला महाविद्या की स्तोत्रात्मक उपासना

उपासना

पासना के संदर्भ में कहा गया है - 'उपगम्य असनम् इति उपासना' अर्थात् भगवान की उपासना से तात्पर्य भगवान के समीप जाकर बैठने से है। यहां 'समीप बैठना' वैध इष्ट होने से यह शब्द भगवान की परिचर्या व पूजा के अर्थ में परिवर्तित हो जाता है।
पञ्चदेव उपासना

हमारे हिंदू धर्मग्रंथों में पंचदेवों की उपासना करने का विधान मिलता है। हर हिंदू को चाहिये कि वह प्रतिदिन पंचदेवों की आराधना अनिवार्य रूप से करे। भगवान के इन पांचों स्वरूपों में से किसी एक की भी उपेक्षा होने से पूजन अधूरा ही रहता है।  ये पंचदेव हैं - गणेश जी , विष्णु जी , शिव जी, दुर्गा जी एवं सूर्य जी। इन पंच देवों में भी ऐक्य(एकत्व) है अर्थात् ये एक ही परमेश्वर की पांच प्रमुख शक्तियां हैं। इन पंच देवों के आराधन से परमेश्वर की अन्य शक्तियों की आराधना भी स्वतः ही हो जाती है क्योंकि वे भी इनकी ही अंगभूता शक्ति हैं। 
पूजा स्थल के सिंहासन में अपने  इष्ट को मध्य में रखने से ये पंचायतन पाँच तरह के होते हैं: 
१-श्री गणेश पंचायतन में देवताओं के मध्य गणेश जी स्थित होते हैं। गणेश पंचायतन का मंत्र है- श्रीगणेशविष्णुशिवदुर्गासूर्येभ्यो नमः। 

यदि आपके इष्ट गणेश हैं तो आप अपने पूजागृह में "गणेश पंचायतन" की स्थापना के लिए सिंहासन के ईशान कोण में विष्णु, आग्नेय कोण में शिव, मध्य में गणेश, नैर्ऋत्य कोण में सूर्य एवं वायव्य कोण में देवी विग्रह को स्थापित करें।

२-श्री विष्णु पंचायतन का मंत्र है- श्रीविष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गाभ्यो नमः। 

पूजागृह में 'विष्णु पंचायतन' की स्थापना करने के लिए सिंहासन के ईशान कोण में शिव, आग्नेय कोण में गणेश, मध्य में विष्णु, नैर्ऋत्य कोण में सूर्य एवं वायव्य कोण में देवी विग्रह को स्थापित करें।

३-श्री शिव पंचायतन का मंत्र है- श्रीशिवविष्णुसूर्यदुर्गागणेशेभ्यो नमः। 

पूजागृह में 'शिव पंचायतन' की स्थापना के लिए आप सिंहासन के ईशान कोण में विष्णु, आग्नेय कोण में सूर्य, मध्य में शिव, नैर्ऋत्य कोण में गणेश एवं वायव्य कोण में देवी विग्रह को स्थापित करें।

४-श्री दुर्गा पंचायतन या देवी पंचायतन का मंत्र है- श्रीदुर्गाविष्णुशिवसूर्यगणेशेभ्यो नमः।

पूजागृह में 'देवी पंचायतन' की स्थापना करने के लिए आप सिंहासन के ईशान कोण में विष्णु, आग्नेय कोण में शिव, मध्य में दुर्गा (देवी), नैर्ऋत्य कोण में गणेश एवं वायव्य कोण में सूर्य विग्रह को स्थापित करें।

५-श्री सूर्य पंचायतन का मंत्र है- श्रीसूर्यशिवगणेशदुर्गाविष्णुभ्यो नमः। 

पूजागृह में 'सूर्य पंचायतन' की स्थापना करने के लिए आप सिंहासन के ईशान कोण में शिव, आग्नेय कोण में गणेश, मध्य में सूर्य, नैर्ऋत्य कोण में विष्णु एवं वायव्य कोण में देवी विग्रह को स्थापित करें।

सम्भव हो तो किसी विशेष पर्व पर उस पर्व से जुड़े देव के पंचायतन के अनुसार व्यवस्था करनी चाहिए जैसे गणेश चतुर्थी पर गणेश पंचायतन, नवरात्रि पर देवी पंचायतन, शिवरात्रि पर शिव पंचायतन, एकादशी पर विष्णु पंचायतन, रविवार या सप्तमी पर सूर्य पंचायतन इत्यादि..

इस प्रकार उपरोक्त में से किसी एक प्रकार के पंचायतन के अनुसार विग्रहों को व्यवस्थित करके उस पंचायतन से संबंधित मन्त्र से भगवान की उपासना करनी चाहिए। 
प्रत्येक छोटी बड़ी पूजा या अनुष्ठान में पहले इन पंचदेवों को अवश्य पूजना चाहिये फिर उस अनुष्ठान को करे।
पञ्चोपचार मानस पूजा कैसे करते हैं हमने इस लिंक में बताया है


टिप्पणियाँ

  1. Devi Bhuvaneswari ke saath kaun kaun se Devi Devta virajman Hote Hain

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    1. भुवनेश्वरी देवी की आराधना श्री यन्त्र पर भी की जाती है इससे श्रीयन्त्र में स्थित समस्त देवी देवता उनके साथ विराजमान हैं..

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    2. भुवनेश्वरी माँ दुर्गा जी का ही रूप हैं अतः श्री दुर्गा पंचायतन के अनुसार उनकी आराधना की जा सकती है : "श्री दुर्गा विष्णु शिव सूर्य गणेशेभ्यो नमः"

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  2. हनुमान जी की पूजा या राम जी की पूजा करने के लिए पंचायतन का निर्माण किस प्रकार किया जाना चाहिए??

    जवाब देंहटाएं
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    1. श्री राम जी व हनुमान जी की पूजा के लिए श्री रामपंचायतन प्रचलित है.. इस व्यवस्था में मध्य में सीता जी सहित श्रीराम विराजमान होते हैं, सीता राम जी के उत्तर पूर्व दिशा में लक्ष्मण जी, दक्षिण पूर्व में भरत जी और दक्षिण पश्चिम में शत्रुघ्न जी की मूर्ति रखे..और उत्तर पश्चिम में अर्थात राम जी के चरण के पास हनुमान जी की प्रतिमा रखे.. मूर्तियाँ न हों तो श्री रामपंचायतन के चित्र भी उपलब्ध रहते हैं उसमें पूजा कर सकते हैं..
      अयोध्या में एक कालेराम मंदिर है वहां संपूर्ण श्रीरामपंचायत एक ही शालिग्राम शिला में हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ है। मध्य में रामजी, उनके वामांग में किशोरी जी, उनके वामांग में भरतलालजी रामजी के दक्षिण लक्ष्मण जी, उनके दक्षिण शत्रुघ्नलाल जी हैं यह श्रीरामपंचायतन राज्याभिषेक का दर्शन है। लखनलाल जी के हाथ में छत्र का दण्ड हैं, शत्रुघ्नलाल जी के हाथ में चंवर एवं भरतलाल जी के हाथ में पंखा, श्री चरणों में सेवाभाव में दक्षिण मुखी श्रीहनुमान जी महाराज विराजमान है। इस कालेराम मंदिर में इस दुर्लभ विग्रह का दर्शन वर्ष में 2 दिन ही होता है संवत्सर के प्रथम दिन एवं रामनवमी के दिन।

      घर के मंदिर में श्री रामपंचायतन को पूजने पर भी मुख्य सिद्धांत यही है कि हमारे 5 प्रमुख देव श्री गणेश, विष्णु, शिव, दुर्गा, सूर्य हैं इन पाँच की पूजा अवश्य करनी चाहिए..
      जय श्री राम

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  3. उत्तर
    1. वैसे तो मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से एकादशी के व्रत लेना शुभ माना जाता है। लेकिन किसी भी शुक्ल पक्ष की एकादशी से यह व्रत शुरू कर सकते हैं। १० जून २०२२ से भी शुरू कर सकते हैं। जय श्री कृष्ण

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