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मारी सनातन परंपरा में नाग केवल भय और रहस्य के प्रतीक नहीं, बल्कि पूज्य देवशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। वेदों से लेकर पुराणों तक, नागों को सृष्टि की रक्षक शक्तियों में गिना गया है — शेषनाग जिन पर स्वयं भगवान विष्णु शयन करते हैं, वासुकि जिन्होंने समुद्र-मंथन में रस्सी का कार्य किया और तक्षक जैसे नाग जिनका उल्लेख महाभारत में मिलता है। इसी आस्था की परिणति है नागपंचमी का पर्व, जब श्रद्धालु नाग देवताओं की स्तुति कर उनसे सुख-समृद्धि और विष-भय से रक्षा की कामना करते हैं।
शास्त्रों के अनुसार, जब कोई जातक पूर्वजन्म में जाने-अनजाने किसी सर्प को शारीरिक पीड़ा पहुँचाता है, उसकी हत्या करता है या उसके प्राकृतिक वास को क्षति पहुँचाता है, तो वही सर्प-श्राप अगले जन्मों में 'सर्प दोष' के रूप में उसकी कुंडली में प्रकट होता है। इसके कारण जीवन में अकारण बाधाएँ, वंश-वृद्धि में रुकावट, मानसिक अशान्ति या अज्ञात भय बना रहता है। ज्योतिष शास्त्र में कुछ कुयोग बताये गये हैं जिनसे पता चलता है कि जातक नाग दोष से ग्रस्त है या नहीं। जैसे महर्षि पराशर द्वारा रचित बृहत्पराशर होरा शास्त्र (अध्याय 35, श्लोक 16) में सर्प योग की परिभाषा इस प्रकार दी गई है:
पापैस्त्रिभिश्च केंद्रस्थैर्भावैः सर्पोऽभिधीयते।
सौम्यैस्त्रिभिश्च केंद्रस्थैर्हंसः प्रोक्तो मुनीश्वरैः॥
अर्थ - जब कुंडली के तीन केंद्र भावों (1, 4, 7, 10) में केवल पाप ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु) स्थित हों और शुभ ग्रह न हों, तब 'सर्प योग' बनता है। नाग दोष की शांति करनी पड़ती है।
नाग-उपासना के हेतु संस्कृत साहित्य में अनेक स्तोत्रों की रचना हुई है जो नागों की महिमा, उनके गुण और उनकी दिव्यता का वर्णन करते हैं। इन स्तोत्रों का पाठ आज भी भारत के विभिन्न प्रांतों में श्रद्धापूर्वक किया जाता है। यहाँ नाग-स्तोत्रों द्वारा नागों की उपासना-विधि प्रस्तुत है। नागराज अष्टोत्तरशत नामावली शास्त्रों में प्राप्त होती है। नागराज अष्टोत्तरशत नामावली और नाग स्तोत्रों के नियमित पाठ से सर्प-श्राप की शान्ति होती है तथा जातक को सुख, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
नागराज देवता कौन हैं?
अनन्त नाग को ही नागों का राजा - सर्पराज या नागराज कहा गया है। कद्रू और कश्यप के ज्येष्ठ पुत्र होने से तथा सर्वशक्तिमान व पृथ्वीधर होने के कारण भगवान शेषनाग को ही समस्त नागों का श्रेष्ठ राजा या नागराज कहा जाता है। ये तो साक्षात श्रीविष्णु जी ही हैं।श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 10, श्लोक 29) में स्वयं श्रीभगवान ने कहा है— "अनन्तश्चास्मि नागानां" (नागों में मैं अनंत नाग हूँ)। भगवान विष्णु के शय्या-स्वरूप और ब्रह्मांड को धारण करने वाले सहस्रफण युक्त दिव्य नाग को ही 'अनंत' कहा जाता है। अनन्त अर्थात् - जिसका कोई अंत न हो। यही 'शेष' हैं क्योंकि प्रलय के बाद भी ये अवश्य शेष रहते हैं।
यहाँ जो नागराज अष्टोत्तरशत नामावली दी गई है इसमें नाग देवता के विभिन्न नाम उनके बारे में कई बातें बताते हैं-
- अगद = विषमुक्त / रोगमुक्त करने वाले।
- अखिलोर्वीचर = अखिल+उर्वी+चर = समस्त पृथ्वी पर विचरण करने वाले
- अमितविक्रम = जिनकी शक्ति और पराक्रम असीम तथा अनन्त है।
- अनिमिषार्चित = 'अनिमिष' - पलक न झपकाने वाले अर्थात् देवता भी नागदेव की उपासना करते हैं।
- विनायकोदर-बद्ध = जिन्होंने भगवान श्री गणेशजी के पेट में कटिसूत्र (नागबंध) के रूप में स्थान पाया है।
- कद्रू-सम्भूत व कश्यपात्मज = महर्षि कश्यप और माता कद्रू के दिव्य पुत्र।
- वट-वृक्षार्चित = जिनका पूजन पवित्र वटवृक्ष (बरगद) के मूल में किया जाता है।
- सुषुम्नाद्वार-मध्यग = योग साधना में रीढ़ की हड्डी में स्थित 'सुषुम्ना नाड़ी' के द्वार पर मूलाधार चक्र (कुण्डलिनी शक्ति) में निवास करने वाले।
- आधारविधि-पथिक = मूलाधार चक्र और आध्यात्मिक चेतना के मार्गदर्शक।
उपरोक्त विवरण व स्तोत्र की फलश्रुतियों के द्वारा नागों की उपासना का विशेष महत्व पता चलता है। ज्योतिष शास्त्र और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इन स्तोत्रों का पाठ नाग देवता के आशीर्वाद, मनोकामना पूर्ति, कालसर्प दोष व राहु-केतु से जुड़े प्रतिकूल प्रभावों की शांति और सुरक्षा के लिए किया जाता है। नाग पंचमी के अलावा हर मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को इनको पढ़ना चाहिए। यदि किसी को सपने में नाग दिखता है तो वह भी इसको करें। अथवा किसी के घर में या आसपास कभी सर्प दिखे तो भी सर्पभय से मुक्ति हेतु यह उपासना करें। नागों की स्तोत्रात्मक उपासना नाग देवताओं से पूर्व जन्मों में हुई भूलों के लिए क्षमा-याचना करने का सर्वोत्तम साधन है।
नागों की स्तोत्रात्मक उपासना
आचमन करें। तीन प्राणायाम करें।आसन व स्वयं का पवित्रीकरण करें।
हाथ में जल - फूल - अक्षत लेकर संकल्प करें -
संकल्प
ॐ श्रीगणपतिर्जयति। विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। ॐ तत्सत् नमः परमात्मने परब्रह्म पुरुषोत्तमाय, श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराह-कल्पे वैवस्वत-मन्वन्तरे अष्टाविंशति-तमे कलियुगे
कलि-प्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्यभूप्रदेशे-----प्रदेशे -----नगरे (......ग्रामे),
----- नाम्नि सम्वत्सरे,सूर्य (उत्तरायणे/दक्षिणायने)-----ऋतौ, ------मासे,-------पक्षे, ----तिथौ, -----नक्षत्रे, -----वासरे
----- गोत्रोत्पन्नो ------(नाम) अहं
अद्य
ग्रहपीडा - सर्पभय - सर्पदोष - विषभय निरसनपूर्वक नवनाग सहित सपरिवार श्री
अनंतनागराज देवता प्रीत्यर्थं, श्री नागराज अष्टोत्तरशत नाम मन्त्रैः यथाशक्ति यजनं नवनाग-यजनं च कृत्वा नागकवच, नागशान्ति आदि स्तोत्रैः स्तुतिं करिष्ये।
(आज के OurHinduDharm पंचांग के अनुसार संकल्प में तिथि आदि स्वतः भर दी गई है)
॥ अनन्त-नागराज अष्टोत्तरशत नामावलिः॥
शतार्चन के लिए या तो नाग आटे / गोबर / मिट्टी / तांबे का हो अथवा तांबे की थाली या वस्त्र दीवार आदि पर पर कुमकुम चंदन से नाग की आकृति बना ले और उस पर अर्चना करें। जिनका जनेऊ संस्कार ना हुआ हो वह ॐ का उच्चारण ओम् (Om) न करें। ह्रीं या औं (Aung) कहें।
ध्यान -
नमस्करोमि देवेश नागेन्द्र हरभूषण ।
अभीष्टदायिने तुभ्यं अहिराज नमो नमः ॥
मानस पूजा - • लं पृथिवी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्री अहिराज अनन्त पादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि। (कनिष्ठिका अंगुली से अंगूठे को मिलाकर अधोमुख(नीची) करके भगवान को दिखाए, यह गन्ध मुद्रा है)
• हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्री नागराज अनन्त पादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि। (अधोमुख तर्जनी व अंगूठा मिलाकर बनी पुष्प मुद्रा दिखाए)
• यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्री अहिराज अनन्त पादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि।(ऊर्ध्वमुख(ऊपर को) तर्जनी व अंगूठे को मिलाकर दिखाए)
• रं वह्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्री अहिराज अनन्त पादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि।(ऊर्ध्व मुख मध्यमा व अंगूठे को दिखाए)
• वं अमृत-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं नागराज अनन्त पादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि।(ऊर्ध्व मुख अनामिका व अंगूठे को दिखाए)
• सौं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलादि सर्वोपचाराणि मनसा परिकल्प्य श्री अहिराज अनन्त श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि।(सभी अंगुलियों को मिलाकर ऊर्ध्वमुखी करते हुए दिखाये)
उपरोक्त मुद्राओं को समझने के लिये यहाँ क्लिक करें।
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| गोबर के नाग व ताम्रनाग |
नागराज अनन्त की विस्तृत पूजा -
ध्यानं -अक्षत पुष्प चढ़ायें -
अनन्त-पद्म-पत्राद्यं फणाननेकतो-ज्ज्वलम्।
दिव्याम्बर-धरं देवं रत्न -कुण्डल मण्डितम्॥१॥
नानारत्न-परिक्षिप्तं मुकुटं द्युति - रंजितम् ।
फणमणि-सहस्राद्यै-रसंख्यै पन्नगोत्तमे ॥२॥
नानाकन्या सहस्रेण समन्तात्परिवारितम् ।
दिव्याभरण दीप्ताङ्गं दिव्यचन्दन चर्चितम् ॥३॥
कालाग्निमिव दुर्धर्षं तेजसादित्य सन्निभम् ।
ब्रह्माण्डाधार-भूतं त्वां यमुनातीर वासिनम् ॥४॥
भजेऽहं दोष - शान्त्यर्थं पूजये कार्यसाधकम्।
आगच्छ कालसर्पाख्य दोषं मम निवारय॥५॥
श्री अनन्त नागराजाय नमो नमः ध्यायामि।
आसनम् – अक्षत चढ़ायें -
नवकुलाधिपं शेषं शुभ्रकच्छप वाहनम्।
नानारत्न समायुक्तं आसनं प्रतिगृह्यताम्॥
पाद्यम् – जल छिड़कें -
अनन्त प्रिय शेषं च जगदाधार विग्रह।
पाद्यं गृहाण भक्त्या त्वं काद्रवेय नमोस्तुते॥
अर्घ्यम् –
काश्यपेयं महाघोरं मुनिभिर्वन्दित प्रभो।
अर्घ्यं गृहाण सर्वज्ञ भक्त्या मां फलदायक ॥
आचमनीयम् –
सहस्र-फण-रूपेण वसुधा-धारक प्रभो।
गृहणाचमनं दिव्यं पावनं च सुशीतलम्॥
पञ्चामृत स्नानम् –
पञ्चामृतं गृहाणेदं पावनं स्वभिषेचनम्।
बलभद्रावतारेश क्षेमं कुरु मम प्रभो॥
वस्त्रम् – वस्त्र या कलावा चढ़ायें-
कौशेय युग्मदेवेश प्रीत्या तव मयार्पितम्।
पन्नगाधीश नागेन्द्र तार्क्ष्य-शत्रो नमोस्तुते॥
यज्ञोपवीतम् – (या कलावा / अक्षत)
सुवर्ण निर्मितं सूत्रं पीतं कण्ठोपहारकम्।
अनेकरत्न संयुक्तं सर्पराज नमोस्तुते॥
अनन्त नागराज नामावलि - पुष्पाक्षत से शतार्चन करें -
- ॐ अनन्ताय नमः।
- ॐ आदिशेषाय नमः।
- ॐ अगदाय नमः।
- ॐ अखिलोर्वीचराय नमः।
- ॐ अमितविक्रमाय नमः।
- ॐ अनिमिषार्चिताय नमः।
- ॐ आदिवन्द्यानिवृत्तये नमः।
- ॐ विनायकोदर-बद्धाय नमः।
- ॐ विष्णुप्रियाय नमः।
- ॐ वेदस्तुत्याय नमः ।
- ॐ विहितधर्माय नमः ।
- ॐ विषधराय नमः ।
- ॐ शेषाय नमः ।
- ॐ शत्रुसूदनाय नमः ।
- ॐ अशेष-फणामण्डल-मण्डिताय नमः ।
- ॐ अप्रति-हतानुग्रह-दायाय नमः ।
- ॐ अमिताचाराय नमः ।
- ॐ अखण्डैश्वर्य-सम्पन्नाय नमः।
- ॐ अमराधिप-स्तुत्याय नमः।
- ॐ अघोररूपाय नमः ।
- ॐ व्याल-व्याप्याय नमः ।
- ॐ वासुकये नमः ।
- ॐ वरप्रदायकाय नमः ।
- ॐ वनचराय नमः ।
- ॐ वंशवर्धनाय नमः ।
- ॐ वासुदेव-शयनाय नमः।
- ॐ वट-वृक्षार्चिताय नमः ।
- ॐ विप्रवेष-धारिणे नमः ।
- ॐ त्वरिता-गमनाय नमः ।
- ॐ तमोरूपाय नमः ।
- ॐ दर्पिकराय नमः ।
- ॐ धरणीधराय नमः ।
- ॐ कश्यपात्मजाय नमः ।
- ॐ काल-रूपाय नमः ।
- ॐ युगाधिपाय नमः ।
- ॐ युगन्धराय नमः ।
- ॐ रश्मिवन्ताय नमः ।
- ॐ रम्यगात्राय नमः ।
- ॐ केशवप्रियाय नमः ।
- ॐ विश्वम्भराय नमः ।
- ॐ शङ्कराभरणाय नमः।
- ॐ शङ्खपालाय नमः ।
- ॐ शम्भुप्रियाय नमः ।
- ॐ षडाननाय नमः ।
- ॐ पञ्चशिरसे नमः ।
- ॐ पापनाशाय नमः ।
- ॐ प्रमदाय नमः ।
- ॐ प्रचण्डाय नमः ।
- ॐ भक्ति-वश्याय नमः ।
- ॐ भक्त-रक्षकाय नमः।
- ॐ बहुशिरसे नमः ।
- ॐ भाग्य-वर्धनाय नमः ।
- ॐ भवभीति-हराय नमः ।
- ॐ तक्षकाय नमः ।
- ॐलोक-त्रयाधीशाय नमः।
- ॐ शिवाय नमः ।
- ॐ वेदवेद्याय नमः ।
- ॐ पूर्णाय नमः ।
- ॐ पुण्याय नमः ।
- ॐ पुण्यकीर्तये नमः ।
- ॐ परेशाय नमः ।
- ॐ पारगाय नमः ।
- ॐ निष्कलाय नमः ।
- ॐ वरप्रदाय नमः ।
- ॐ कर्कोटकाय नमः ।
- ॐ श्रेष्ठाय नमः ।
- ॐ शान्ताय नमः ।
- ॐ दान्ताय नमः ।
- ॐ आदित्य-मर्दनाय नमः।
- ॐ सर्व-पूज्याय नमः ।
- ॐ सर्वाकाराय नमः ।
- ॐ निराश्रयाय नमः ।
- ॐ निरञ्जनाय नमः ।
- ॐ ऐरावताय नमः ।
- ॐ शरण्याय नमः ।
- ॐ सर्वदायकाय नमः ।
- ॐ धनञ्जयाय नमः ।
- ॐ अव्यक्ताय नमः ।
- ॐ व्यक्तरूपाय नमः ।
- ॐ तमोहराय नमः ।
- ॐ योगीश्वराय नमः ।
- ॐ कल्याणाय नमः ।
- ॐ वालाय नमः ।
- ॐ ब्रह्मचारिणे नमः ।
- ॐ शङ्करानन्द-कराय नमः।
- ॐ जितक्रोधाय नमः ।
- ॐ जीवाय नमः ।
- ॐ जयदाय नमः ।
- ॐ जप-प्रियाय नमः ।
- ॐ विश्वरूपाय नमः ।
- ॐ विधिस्तुताय नमः ।
- ॐ विधेन्द्रशिव-संस्तुत्याय नमः।
- ॐ श्रेयप्रदाय नमः ।
- ॐ प्राणदाय नमः ।
- ॐ विष्णुतल्पाय नमः।
- ॐ गुप्ताय नमः।
- ॐ गुप्त-तराय नमः।
- ॐ रक्तवस्त्राय नमः।
- ॐ रक्तभूषाय नमः।
- ॐ भुजङ्गाय नमः।
- ॐ भयरूपाय नमः।
- ॐ सरीसृपाय नमः।
- ॐ सकलरूपाय नमः ।
- ॐ कद्रू-सम्भूताय नमः।
- ॐ आधारविधि-पथिकाय नमः।
- ॐ सुषुम्नाद्वार-मध्यगाय नमः।
- ॐ फणिरत्नविभूषणाय नमः।
- ॐ नागेन्द्राय नमः।
॥नव नाग पूजन॥
नाग की आकृति की सभी दिशाओं में निर्देशानुसार अक्षत पुष्प से पूजा करे-
अनन्त नाग [मध्य में चढ़ायें] -
अनन्तं विप्रवर्गं च रक्त कुंकुम वर्णकम्।
सहस्त्र फण संयुक्तं तं देवं प्रणमाम्यहम्॥१॥
श्री अनन्त नागं आवाहयामि पूजयामि नम:॥
शेष नाग [पूर्व दिशा में चढ़ायें] -
विप्रवर्गं श्वेतवर्णं सहस्त्रफणसंयुतम्।
आवाहयाम्यहं देवं शेष वै विश्वरुपिणम्॥२॥
श्री शेष नागं आवाहयामि पूजयामि नम:॥
वासुकी नाग [दक्षिण-पूर्व दिशा] -
क्षत्रिय पीतवर्णं च फणैर्सप्तशतैर्युतम्।
युक्तमतुंगकायं च वासुकी प्रणमाम्यहम्॥३॥
श्री वासुकी नागं आवाहयामि पूजयामि नम:॥
तक्षक नाग [दक्षिण में]-
वैश्यवर्गं नीलवर्णं फणै: पंचशतैर्युतम्।
युक्तमुतुंग्कायं च तक्षकं प्रणमाम्यहम्॥४॥
श्री तक्षक नागं आवाहयामि पूजयामि नम:॥
कर्कोटक नाग [ दक्षिण-पश्चिम दिशा में पूजें ] -
शूद्रवर्गं श्वेतवर्णं शतत्रयफणैर्युतम्।
युक्तमुत्तुंगकायं च कर्कोटं च नमाम्यहम्॥५॥
श्री कर्कोटक नागं आवाहयामि पूजयामि नम:॥
शंखपाल नाग [पश्चिम में] -
शंखपालं क्षत्रियं च पत्र सप्तशतै: फणै:।
युक्तमुत्तुंग कायं च शिरसा प्रणमाम्यहम्॥६॥
श्री शंखपाल नागं आवाहयामि पूजयामि नम:॥
नील नाग [उत्तर - पश्चिम में] -
वैश्यवर्गं नीलवर्णं फणै: पंचशतैर्युतम्।
युक्तमत्तुंगकायं च तं नीलं प्रणमाम्यहम्॥७॥
श्री नील नागं आवाहयामि पूजयामि नम:॥
कम्बल नाग [उत्तर में] -
कम्बलं शूद्रवर्णं च शतत्रयफणैर्युतम् ।
आवाहयामि नागेशं प्रणमामि पुन: पुन:॥८॥
श्री कम्बल नागं आवाहयामि पूजयामि नम:॥
महापद्म नाग [ उत्तर पूर्व में ] -
वैश्यवर्गं नीलवर्णं पत्रं पंच शतैर्युतम्।
युक्तमत्तुंग कायं च महापद्मं नमाम्यहम्॥९॥
श्री महापद्म नागं आवाहयामि पूजयामि नम:॥
अब हाथ जोड़कर निम्न स्तोत्रों को पढ़ लें -
नाग कवच स्तोत्रम्॥
अस्य श्रीनागराजदेवस्य कवचस्य महादेव ऋषिः, गायत्री छन्दः ताराबीजं, शिवाशक्तिः, क्रोधबीज कीलकं, फणामणिविराजितः नागराजो देवता सर्वकामार्थ सिद्ध्यर्थे विनियोगः॥
कवचं
अनन्तो मे शिरः पातु कण्ठं सङ्कर्षणस्तथा॥१॥
कर्कोटको नेत्रयुग्मं कपिलः कर्णयुग्मकम्।
वक्षःस्थलं नागयक्षः बाहू कालभुजङ्गमः॥२॥
उदरं धृतराष्ट्रश्च वज्रनागस्तु पृष्ठकम्।
मर्माङ्गमश्वसेनस्तु पादावश्वतरोऽवतु॥३॥
वासुकिः पातु मां प्राच्ये आग्नेयां तु धनञ्जयः।
तक्षको दक्षिणे पातु नैरृत्यां शङ्खपालकः॥४॥
महापद्मः प्रतीच्यां तु वायव्यां शङ्खनीलकः।
उत्तरे कम्बलः पातु ईशान्यां नागभैरवः॥५॥
ऊर्ध्वं चैरावतोऽधस्तात् नागभेतालनायकः।
सदा सर्वत्र मां पातु नागलोकाधिनायकाः॥६॥
॥नागकवचम् शुभमस्तु॥
॥ नवनाग स्तोत्रम् ॥
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम् ।
शङ्खपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा ॥ १॥
एतानि नवनामानि नागानां च महात्मनाम् ।
सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः ॥ २॥
तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ३॥
॥नागशान्ति स्तोत्रम्॥
आरक्तेन शरीरेण रक्तान्तायतलोचनः ।
महाभोगकृताटोपः शङ्खाब्जकृतलाञ्छनः ॥ १॥
अनन्तो नागराजेन्द्रः शिवपादार्चने रतः ।
महापापविषं हत्वा शान्तिमाशु करोतु मे ॥ २॥
सुश्वेतेन तु देहेन सुश्वेतोत्पलशेखरः ।
चारुभोगकृताटोपो हारचारुविभूषणः ॥ ३॥
वासुकिर्नाम नागेन्द्रो रुद्रपूजापरो महान् ।
महापापं विषं हत्वा शान्तिमाशु (शान्तिं आशु) करोतु मे ॥ ४॥
अतिपीतेन देहेन विस्फुरद्भोगसम्पदा ।
तेजसाचाऽतिदीप्तेन कृतः स्वस्तिकलाञ्छनः ॥ ५॥
नागराट् तक्षकः श्रीमान्नागकोट्यासमन्वितः ।
करोतु मे महाशान्तिं सर्वदोषविषावहः ॥ ६॥
अतिकृष्णेन वर्णेन स्फुटो विकटमस्तकः ।
कण्ठे रेखात्रयोपेतो घोरदंष्ट्रायुधोद्यतः ॥ ७॥
कर्कोटको महानागो विषदर्पबलाऽन्वितः ।
विषशस्त्राग्निसन्तापं हत्वा शान्तिं करोतु मे ॥ ८॥
पद्मवर्णेन देहेन चारुपद्मायतेक्षणः ।
पञ्चबिन्दुकृताभासो ग्रीवायां शुभलक्षणः ॥ ९॥
ख्यातः पद्मो महानागो हरपादार्चने रतः ।
करोतु मे महाशान्तिं महापापं विषक्षयम् ॥ १०॥
पुण्डरीकनिभेनाऽपि देहेनाऽमिततेजसा ।
शङ्खशूलाब्जरुचिरैर्भूषितो मूर्ध्नि सर्वदा ॥ ११॥
महापद्मो महानागो नित्यं पशुपतौ रतः ।
विनिर्धूत(विनिहत्य) विषं घोरं शान्तिमाशु करोतु मे ॥ १२॥
श्यामेन देहभारेण श्रीमत्कमललोचनः ।
विषदर्पबलोन्मत्तो ग्रीवायामेकरेखया ॥ १३॥
शङ्खपालः श्रिया दीप्तः शिवपादाब्जपूजकः ।
महाविषं महापापं हत्वा शान्तिं करोतु मे ॥ १४॥
अतिगौरेण देहेन चन्द्रार्धकृतमस्तकः ।
दीप्तभोगकृताटोपः शुभलक्षणलक्षितः ॥ १५॥
कुलिको नागराजेशो नित्यं हरपरायणः ।
अपहृत्य विषं घोरं करोतु मम शान्तिकम् ॥ १६॥
अन्तरिक्षे च ये नागा ये नागाः स्वर्गसंस्थिताः ।
गिरिकन्दरदुर्गेषु ये नागा भूमिसंस्थिताः ॥ १७॥
पाताले ये स्थिता नागाः सर्वेप्यन्ये समाहिताः ।
रुद्रपादार्चने शान्ताः कुर्वन्तु मम शान्तिकम् ॥ १८॥
नागिन्यो नागपत्न्यश्च तथा कन्याः कुमारिकाः ।
शिवभक्ताः सुमनसः शान्तिं कुर्वन्तु मे सदा ॥ १९॥
यदिदं नागसंस्थानं कीर्तनाच्छ्रवणादपि ।
न तं सर्पा विहिंसन्ति न विषं क्रमते सदा ॥ २०॥
चिन्तितं लभ्यते नित्यं तथा पापपरिक्षयः ।
सिद्धिमाशु प्रयच्छन्ति सर्वविघ्न विवर्जिताः ॥ २१॥
॥ श्री नागशान्तिस्तोत्रं शुभमस्तु ॥
[नाग शान्ति स्तोत्र के पाठ से मनोकामना पूर्ति होती है और पापों का नाश होता है सभी विघ्नों का नाश होता है और सफलता प्राप्त होती है। ]
॥उत्तङ्गकृतं नागस्तोत्रम्॥
य ऐरावतराजानः सर्पाः समितिशोभनाः।
वर्षन्त इव जीमूताः सविद्युत्पवनेरिताः॥१॥
सुरूपाश्च विरूपाश्च तथा कल्माषकुण्डलाः।
आदित्यवन्नाकपृष्ठे रेजुरैरावतोद्भवाः॥२॥
बहूनि नागवर्त्मानि गङ्गायास्तीर उत्तरे।
इच्छेत्कोऽर्कांशुसेनायां चर्तुमैरावतं विना॥३॥
शतान्यशीतिरष्टौ च सहस्राणि च विंशतिः।
सर्पाणां प्रग्रहा यान्ति धृतराष्ट्रो यदेजति॥४॥
ये चैनमुपसर्पन्ति ये च दूरं परं गताः।
अहमैरावतज्येष्ठभ्रातृभ्योऽकरवं नमः॥५॥
यस्य वासः कुरुक्षेत्रे खाण्डवे चाभवत्सदा।
तं काद्रवेयमस्तौषं कुण्डलार्थाय तक्षकम्॥६॥
तक्षकश्चाश्वसेनश्च नित्यं सहचरावुभौ।
कुरुक्षेत्रे निवसतां नदीमिक्षुमतीमनु॥७॥
जघन्यजस्तक्षकस्य श्रुतसेनेति यः श्रुतः।
अवसद्यो महद्द्युम्नि प्रार्थयन्नागमुख्यताम्॥८॥
करवाणि सदा चाहं नमस्तस्मै महात्मने॥९॥
॥ श्री महाभारते आदिपर्वणि तृतीये अध्याये
उत्तङ्गकृतं नागस्तोत्रं शुभमस्तु ॥
(१३९ से १४६ श्लोक में है)
॥सर्पभयनाशक श्री मनसादेवी स्तोत्रम्॥
ध्यानं-
चारु-चम्पक-वर्णाभां, सर्वांग-सु-मनोहराम् ।
नागेन्द्र-वाहिनीं देवीं, सर्व-विद्या-विशारदाम् ।।
श्री मनसा स्तोत्रं-
॥श्रीनारायण उवाच॥
नमः सिद्धि-स्वरुपायै, वरदायै नमो नमः ।
नमः कश्यप-कन्यायै, शंकरायै नमो नमः ।।
बालानां रक्षण-कर्त्र्यै, नाग-देव्यै नमो नमः ।
नमः आस्तीक-मात्रे ते, जरत्-कार्व्यै नमो नमः ।।
तपस्विन्यै च योगिन्यै, नाग-स्वस्रे नमो नमः ।
साध्व्यै तपस्या-रुपायै, शम्भु-शिष्यायै च ते नमः ।।
फलश्रुति -
इति ते कथितं लक्ष्मि! मनसाया स्तवं महत् ।
यः पठति नित्यमिदं, श्रावयेद् वापि भक्तितः ।।
न तस्य सर्प-भीतिर्वै, विषोऽप्यमृतं भवति ।
वंशजानां नाग-भयं, नास्ति श्रवण-मात्रतः ।।
[श्रीविष्णु जी ने कहा - हे लक्ष्मी! यह मनसा देवी का महान् स्तोत्र है। जो नित्य भक्ति-पूर्वक इसे पढ़ता या सुनता है उसे साँपों का भय नहीं होता और विष भी अमृत हो जाता है। उसके वंश में जन्म लेनेवालों को इसके श्रवण मात्र से सर्पों का भय नहीं होता।]
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| Kalikeshwar temple |
IIसर्प-भय-विनाशन नागिनी द्वादश नाम स्तोत्रम्II
जरत्कारुर्जगद्-गौरी, मनसा सिद्ध-योगिनी ।
वैष्णवी नाग-भगिनी, शैवी नागेश्वरी तथा ।।
जरत्कारु-प्रियाऽ आस्तीक-माता विष-हरेति च ।
महाज्ञान-युता चैव, सा देवी विश्व-पूजिता ।।
द्वादशैतानि नामानि, पूजा-काले तु यः पठेत् ।
तस्य नाग-भयं नास्ति, सर्वत्र विजयी भवेत् ।।
[जो जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तीकमाता, विष-हरा और महाज्ञानयुता है वह देवी सारे संसार में पूजी जाती है। पूजन काल में जो व्यक्ति इन बारह नामों को पढ़ता है, उसे नागों का भय नहीं होता और सभी कार्यों में विजय मिलती है। ]
अब २८ या १०८ बार नागगायत्री मंत्र जपे -
॥नवकुल नागाय विद्महे, विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्पः प्रचोदयात्॥
अब जप समर्पण हेतु आचमनी से शिव जी को जल चढ़ायें-
गुह्यातिगुह्य गोप्ता त्वं गृहाणास्मत् कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात् सुरेश्वरः॥
यत्कृतं सर्वं श्री साम्ब सदाशिवार्पणमस्तु
प्रार्थना- हाथ जोड़कर कहें -
सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले।
ये च हेलिमरीचिस्था येऽन्तरे दिवि संस्थिता:॥
ये नदीषु महानागा ये सरस्वति-गामिन:।
ये च वापी-तडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:॥
अर्थात् - संपूर्ण आकाश, पृथ्वी, स्वर्ग, सरोवर-तालाबों, नल-कूप, सूर्य किरणें आदि जहां-जहां भी नाग देवता विराजमान है। वे सभी हमारे दुखों को दूर करके हमें सुख-शांतिपूर्वक जीवन दें। उन सभी को हमारी ओर से प्रणाम है।
हाथ जोड़कर क्षमा याचना करें -
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं नागेश्वरः।
यत्पूजितं मया देव प्रसीद परमेश्वर॥
अच्युताय नमः। अनंताय नमः। गोविंदाय नमः।
शिव शिव शिव।
श्रीविष्णुः। श्रीविष्णुः। श्रीविष्णुः।
विसर्जन - शास्त्रों में मिट्टी, गोबर या आटे जैसी प्राकृतिक सामग्री से निर्मित पार्थिव प्रतिमाओं के पूजन के पश्चात् उनका विसर्जन अनिवार्य माना गया है। विसर्जन का तात्पर्य देवशक्ति को उनके मूल धाम भेजना और प्राकृतिक तत्वों को पुनः प्रकृति में विलीन करना है। पूजन,
व स्तोत्र पाठ पूर्ण होने के बाद (उसी दिन शाम को या अगले दिन) विसर्जन किया जाता है। विसर्जन से पूर्व हाथ में जल और अक्षत लेकर नाग देवता से पूजा स्वीकार करने तथा जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा-प्रार्थना करें।
गोबर से बनी नाग प्रतिमा को किसी पवित्र नदी, जलकुंड या घर में ही गमले या वृक्ष की जड़ में मिट्टी में दबाकर स्वच्छ जल डालकर विसर्जित कर दें।
गोबर प्राकृतिक और सर्वथा पवित्र होता है। मिट्टी में विसर्जन करने पर यह भूमि को उर्वर बनाता है, जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहता है। विसर्जन का मन्त्र -
यान्तु नागगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्।
इष्टकामसमृद्धयर्थं पुनरागमनाय च॥
सर्वरक्षां कुरुष्वेश ग्रहपीडां निवारय।
ममायुष्यं कुरुष्व त्वं सर्वदा च सुखप्रदः॥
गच्छ गच्छ नागश्रेष्ठ स्वस्थाने नागनायक।
इमां पूजां गृहीत्वा त्वं ममाभीष्टफलदो भव॥
इस प्रकार से नागों की स्तोत्रात्मक उपासना संपन्न होती है।
नाग पंचमी पर नागों को अनेकों प्रणाम🙏
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