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श्री शनैश्चर अष्टोत्तरशत नाम स्तोत्र पूजन साधना

भ गवान की अतिशय कृपा है कि ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से  हमको भविष्य में आने वाली बाधाओं का तो पूर्वानुमान होता है ही बल्कि सम्बन्धित ग्रह के उपाय से हम उन बाधाओं से मुक्ति भी पा सकते हैं।   जातक की कुंडली या ग्रह गोचर में शनि ग्रह के प्रतिकूल होने पर जातक को निम्न परेशानी रहती हैं - ऋण, दुःख, पैरों की तकलीफ, मन्दाग्नि, वात-वमन, शरीर में कम्पन, अकस्मात चोट-दुर्घटना, दीर्घकालीन, बीमारियां, शरीर की दुर्बलता, अपयश, मुकदमेबाजी में उलझाव, किसी से अकारण शत्रुता हो जाना और बुरी आदतें जैसे चोरी, सट्टा, नशे की लत लग जाना आदि कुप्रभाव देखने को मिलते हैं। कहा जाता है कि शनि ग्रह अपने आप किसी को परेशान नहीं करता बल्कि "दंडाधिकारी" होने से जातक को पिछले जन्म में किये गये बुरे कर्मों का फल देता है हम पिछले जन्म के कर्म तो नहीं बदल सकते परन्तु प्रायश्चित स्वरूप पूजा-साधना करके शनिदेव को प्रसन्न करके हम इस जन्म में आ रही बाधाओं से छुटकारा पा सकते हैं। ज्येष्ठ मास की अमावस्या  को शनिदेव का प्रादुर्भाव हुआ था इसलिए इस दिन शनि जयंती मनाई जाती है। शनि देव की अनुकूलता के लिए...


एकादशी व्रत के उद्यापन की विस्तृत विधि

व्र त एक तप है तो उद्यापन उसकी पूर्णता है। उद्यापन वर्ष में एक बार किया जाता है इसके अंग हैं- व्रत , पूजन , जागरण , हवन , दान , ब्राह्मण भोजन , पारण । समय व जानकारी के अभाव में कम लोग ही पूर्ण विधि - विधान के साथ उद्यापन कर पाते हैं। प्रत्येक व्रत के उद्यापन की अलग - अलग शास्त्रसम्मत विधि होती है। इसी क्रम में शुक्ल और कृष्ण पक्ष की एकादशियों का उद्यापन करने की विस्तृत शास्त्रोक्त विधि आपके समक्ष प्रस्तुत है। वर्ष भर के 24 एकादशी व्रत किसी ने कर लिये हों तो वो उसके लिए उद्यापन करे। जिसने एकादशी व्रत अभी नहीं शुरु किये लेकिन आगे से शुरुआत करनी है तो वह भी पहले ही एकादशी उद्यापन कर सकते हैं और उस उद्यापन के बाद 24 एकादशी व्रत रख ले। कुछ लोग साल भर केवल कृष्ण पक्ष के 12 एकादशी व्रत लेकर उनका ही उद्यापन करते हैं तो कुछ लोग साल भर के 12 शुक्ल एकादशी व्रत लेकर उनका ही उद्यापन भी करते हैं। अतः जैसी इच्छा हो वैसे करे लेकिन उद्यापन अवश्य ही करे तभी व्रत को पूर्णता मिलती है। कृष्ण पक्ष वाले व्रतों का उद्यापन कृष्ण पक्ष की एकादशी-द्वादशी को करे , शुक्ल पक्ष वाले व्रतों का उ...


भुवनेश्वरी महाविद्या हैं मूल प्रकृति और आद्याशक्ति [त्रैलोक्य मंगल कवच]

भा द्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि भगवती भुवनेश्वरी की प्रादुर्भाव तिथि है। भुवनेश्वरी देवी को चतुर्थी महाविद्या कहा गया है किन्तु आद्याशक्ति भुवनेश्वरी ही हैं उन्हीं से सबका प्रादुर्भाव हुआ है, ऐसा कथन कुञ्जिका तन्त्र में है- भुवनानां पालकत्वाद् भुवनेशी प्रकीर्तिता ।  सृष्टि-स्थिति-करी देवी भुवनेशी प्रकीर्तिता।। अर्थात् त्रिभुवन की सृष्टि, स्थिति और पालन करती हैं, इस कारण भुवनेशी अर्थात् भुवन की ईश्वरी कही जाती हैं। तोड़ल तन्त्र में भी कहा है- श्रीमद्-भुवन-सुन्दर्या दक्षिणे त्र्यम्बकं यजेत्। स्वर्गे मर्त्ये च पाताले सा आद्या भुवनेश्वरी। यहाँ भी महाविद्या भुवनेश्वरी आद्या कहीं गई हैं। इसी तोड़ल तन्त्र में दस महाविद्याओं के निरूपण में श्री महादेव जी ने कहा है- 'भुवनेश्वरी देवी के भैरव त्र्यम्बक हैं। इनकी अर्चना भुवन-सुंदरी के दक्षिण भाग में करे।'


भगवान हयग्रीव की आराधना दिलाती है वांछित फल

भ गवान हयग्रीव अथवा हयशीर्ष भगवान विष्णु जी के ही अवतार हैं... इनका सिर घोड़े का है। पुराणों में भगवान के इस स्वरूप से संबन्धित कथाएँ मिलती हैं।  कल्प भेद हरि चरित सुहाए  - तुलसीदास जी के अनुसार हर कल्प में भगवान भिन्न-भिन्न प्रकार से सुहावनी लीला रचते हैं। सृष्टि के आदिकाल में क्षीरोदधि में अनन्त-शायी प्रभु नारायण की नाभि से पद्म प्रकट हुआ। पद्म-की कर्णिका से सिन्दूरारुण चतुर्मुख लोकस्रष्टा ब्रह्माजी व्यक्त हुए। क्षीरोदधि से दो बिन्दु निकलकर कमल पऱ पहुँच गये।


त्राणकर्त्री वेदमाता गायत्री की जयंती

श्रा वण शुक्ल पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन, संस्कृत दिवस, लव-कुश जयंती के साथ-साथ "भगवती गायत्री जयंती" मनाई जाती है। मतांतर से ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भी देवी गायत्री की जयन्ती तिथि बतलायी गई है।गौ, गंगा तथा गायत्री हिन्दुत्व की त्रिवेणी कहलाती है। ये तीनों ही अति पवित्र कहे गए हैं तथा भव बंधनों से मुक्ति दिलाते हैं। समस्त वेदों का सार तथा समस्त देवों की शक्तियाँ गायत्री मंत्र में निहित हैं। वेदमाता कहलाने वाली ये माँ भगवती अपने गायक/ जपकर्ता का पतन से त्राण कर देती हैं ; इसीलिए 'गायत्री' कहलाती हैं। जो गायत्री का जप करके शुद्ध हो गया है, वही धर्म-कर्म के लिये योग्य कहलाता है और दान, जप, होम व पूजा सभी कर्मों के लिये वही शुद्ध पात्र है। नित्य संध्या करने वाला होने के कारण शास्त्रों में ब्राह्मणों को दान करने के लिये कहा जाता है। क्योंकि जो दान की वस्तु को पाता है उसे प्रतिग्रह का दोष लग जाता है लेकिन यदि वह व्यक्ति गायत्री जप करता है तो प्रतिग्रह के दोष से मुक्त हो जाता है। कोई भी शुभ कर्म हो विवाह, अनुष्ठान, पूजा आदि हो तो सबसे पहले संध्या ...


श्री गणेश चतुर्थी व्रत तथा स्यमन्तक मणि का अपकीर्तिनाशक आख्यान

भ गवान  श्रीगणेश   का   जन्म भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न   के समय   हुआ था। अत: यह   श्री गणेश चतुर्थी तिथि   मध्याह्नव्यापिनी लेनी चाहिये। इस दिन रविवार अथवा मंगलवार हो तो प्रशस्त है। गणेशजी हिन्दूधर्म   के   प्रथम पूज्य देवता  हैं। सनातन धर्मानुयायी स्मार्तों के देवताओं में विघ्नविनायक गणेशजी प्रमुख हैं। हिन्दुओं   के   घर   में   चाहे जैसी पूजा या   धार्मिक आयोजन   हो ,   सर्वप्रथम श्रीगणेशजी का   आवाहन और पूजन  किया जाता है। शुभ कार्यों मेँ गणेश   जी   की स्तुति का अत्यन्त महत्त्व माना गया है । गणेश जी  समस्त  विघ्नों   को दूर करने वाले देवता हैं। इनका मुख हाथी का ,   उदर लम्बा तथा शेष   शरीर मनुष्य के समान है। मोदक इन्हें विशेष प्रिय है।  बंगाल की   दुर्गापूजा   की तरह   ही   महाराष्ट्र में   गणेश जी की पूजा   एक   राष्ट्रीय   पर्व के   रूप में प्रतिष्ठित   है।


श्री कल्कि अवतार-धारी भगवान की अधर्मनाशक आराधना

हि न्दू   धर्मग्रंथों के अनुसार ,   सतयुग , द्वापर ,   त्रेतायुग   बीतने के बाद   यह   वर्तमान युग   कलियुग   है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए कथन के अनुसार-   जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है , तब तब श्रीहरि स्वयं की सृष्टि करते हैं , अर्थात् भगवान्   अवतार ग्रहण करते हैं। साधु-सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए श्रीकृष्ण विभिन्न युगों में अवतरित होते हैं और आगे भी होते रहेंगे- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌। धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥       कल्कि पुराण में वर्णन है कि चौथे चरण में कलियुग जब अपनी चरम सीमा तक   पहुँच जाएगा , तब अपराध-पाप-अनाचार अत्यन्त   बढ़ जायेंगे ; अधर्म-लूटपाट-हत्या तो सामान्य बात हो   जायेगी यहाँ तक कि लोग   ईश्वर-सत्कर्म-धर्म सब   भूल   जायेंगे।   तब   भगवान श्रीहरि अ...


श्री जानकीनवमी व्रत पर श्री राम प्रिया सीता जी की पूजा का विधि-विधान

पू जा -विधि   अथवा व्रत विधि को पढ़ना मात्र भी आध्यात्मिक लाभ देता है क्योंकि इतने मात्र से भी मन से प्रभु का स्मरण हो जाता है।   हिन्दू-समाज में जिस प्रकार   श्री राम नवमी   का माहात्म्य   है ,   उसी प्रकार   श्री जानकी नवमी   का   भी है।       जिस  प्र का र अष्टमी तिथि भगवती राधा तथा भग वान  श्रीकृष्ण के आवि र्भाव  से सम्बद्ध है ,  उसी प्रकार नवमी तिथि भगवती सीता तथा भगवान् श्रीराम के आविर्भाव की तिथि होने से परमाद रणी या है ।  जिस प्रकार  भगवती रा धा  का आविर्भाव भाद्रपद शुक्ल अष्टमी और भग वान  श्रीकृष्ण का आविर्भाव भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को अर्थात् दो विभिन्न अष्टमी तिथियों में हुआ ,  उसी प्रकार भगवती सी ता का  आविर्भाव वैशाख शुक्ल नवमी   को  और भगवान् श्रीराम का आविर्भाव चैत्र शुक्ल न व मी को अर्थात् दो विभिन्न नवमी तिथियों मेँ हुआ।  हिंदू- मात्र के परमाराध्य श्रीसीताराम तथा श्रीराधा कृष्ण से  सम्बद्ध ये  जयन्ती  दिवस अति पावन ...


वासन्तीय या चैत्र नवरात्रों का महत्व

व सन्त ऋतु के आगमन के पश्चात एक के  बा द एक  व्रतोत्सव-पर्व- त्यौहारों के आने का क्रम प्रारम्भ होने लगता है ।   वसन्त  ऋतु   में  सभी के हृदय में रस का  संचा र होता है ,  सभी  उमंग से  भरे रहते हैं  इसी कारण  देव-देवी की पूजा इत्यादि में वे प्रसन्न रहते हैं।  साथ ही  बुरे कर्मों  को करने की प्रवृत्ति  से नर और नारी  को  बचाने के लिए  भी इन उत्सवों का प्रयोजन है।  वै शाख का पूरा महीना कुमारी  क न्याओं के लिए व्रत करने का  समय  है। कन्याएँ ठीक पथ पर र हें ,  इसलिए वैशाख के महीने में उनकी माँ ,  दादी इत्यादि व्रत करवाती हैं।  किसी मत से  फा ल्गु न और  चै त्र  मास में  वसन्त-ऋतु  मानी जाती  है और किसी के मत से  चै त्र और  वैशाख   मास में।  वै शाख का दूसरा नाम  ' माधव '  है और  चैत्र मास  का  ‘ मधु ’  नाम है।  हिंदू धर्म के प्रति आस्थावान श्रद्धालुगण वसन्त ऋतु में मधु मा...


विश्व-संस्कृति के रक्षक व प्रतिष्ठापक श्री मत्स्य भगवान की जयन्ती

भ गवान  श्रीहरि के चौबीस प्रमुख अवतार हैं, उन अवतारों की प्रादुर्भाव(जयन्ती) तिथि पर भक्तजन उत्सव किया करते हैं।   अवतारों की जयंती तिथियों पर श्रद्धालुगण उन अवतारों की विविध प्रकार से आराधना किया करते हैं।  पुराणों के अनुसार लीलाविहारी  परमकृपालु  भगवान् नारायण धर्म की संस्थापना के लिए समय-समय पर विविध अवतार लिया करते हैं।   चैत्र शुक्ल तृतीया श्रीमत्स्य भगवान की जयंती तिथि है।


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