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अगस्त, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भगवान हयग्रीव की आराधना दिलाती है वांछित फल

भ गवान हयग्रीव अथवा हयशीर्ष भगवान विष्णु जी के ही अवतार हैं... इनका सिर घोड़े का है। पुराणों में भगवान के इस स्वरूप से संबन्धित कथाएँ मिलती हैं।  कल्प भेद हरि चरित सुहाए  - तुलसीदास जी के अनुसार हर कल्प में भगवान भिन्न-भिन्न प्रकार से सुहावनी लीला रचते हैं। सृष्टि के आदिकाल में क्षीरोदधि में अनन्त-शायी प्रभु नारायण की नाभि से पद्म प्रकट हुआ। पद्म-की कर्णिका से सिन्दूरारुण चतुर्मुख लोकस्रष्टा ब्रह्माजी व्यक्त हुए। क्षीरोदधि से दो बिन्दु निकलकर कमल पऱ पहुँच गये।


त्राणकर्त्री वेदमाता गायत्री की जयंती

श्रा वण शुक्ल पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन, संस्कृत दिवस, लव-कुश जयंती के साथ-साथ "भगवती गायत्री जयंती" मनाई जाती है। मतांतर से ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भी देवी गायत्री की जयन्ती तिथि बतलायी गई है।गौ, गंगा तथा गायत्री हिन्दुत्व की त्रिवेणी कहलाती है। ये तीनों ही अति पवित्र कहे गए हैं तथा भव बंधनों से मुक्ति दिलाते हैं। समस्त वेदों का सार तथा समस्त देवों की शक्तियाँ गायत्री मंत्र में निहित हैं। वेदमाता कहलाने वाली ये माँ भगवती अपने गायक/ जपकर्ता का पतन से त्राण कर देती हैं ; इसीलिए 'गायत्री' कहलाती हैं। जो गायत्री का जप करके शुद्ध हो गया है, वही धर्म-कर्म के लिये योग्य कहलाता है और दान, जप, होम व पूजा सभी कर्मों के लिये वही शुद्ध पात्र है। नित्य संध्या करने वाला होने के कारण शास्त्रों में ब्राह्मणों को दान करने के लिये कहा जाता है। क्योंकि जो दान की वस्तु को पाता है उसे प्रतिग्रह का दोष लग जाता है लेकिन यदि वह व्यक्ति गायत्री जप करता है तो प्रतिग्रह के दोष से मुक्त हो जाता है। कोई भी शुभ कर्म हो विवाह, अनुष्ठान, पूजा आदि हो तो सबसे पहले संध्या ...