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भ गवती आद्याशक्ति के दशमहाविद्यात्मक दस स्वरूपों में एक स्वरूप भगवती तारा का है। क्रोधरात्रि में भगवती तारा का प्रादुर्भाव हुआ था । चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को महाविद्या तारा की जयन्ती तिथि बतलाई गई है। महाविद्या काली को ही नीलरूपा होने के कारण तारा भी कहा गया है। वचनान्तर से तारा नाम का रहस्य यह भी है कि ये सर्वदा मोक्ष देने वाली, तारने वाली हैं इसलिये इन्हें तारा कहा जाता है- तारकत्वात् सदा तारा सुख-मोक्ष-प्रदायि नी। महाविद्याओं के क्रम में ये द्वितीय स्थान पर परिगणित की जाती हैं। रात्रिदेवी की स्वरूपा शक्ति भगवती तारा दसों महाविद्याओं में अद्भुत प्रभाववाली और सिद्धि की अधिष्ठात्री देवी कही गयी हैं। भगवती तारा के तीन रूप हैं- तारा, एकजटा और नीलसरस्वती। श्री तारा महाविद्या के इन तीनों रूपों के रहस्य, कार्य-कलाप तथा ध्यान परस्पर भिन्न हैं किन्तु भिन्न होते हुए भी सबकी शक्ति समान और एक ही है। 1. नीलसरस्वती अनायास ही वाक्शक्ति प्रदान करने में समर्थ हैं, इसलिये...