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हिंदू नवसंवत्सर मंगलमय हो (2082 - सिद्धार्थ)

हि न्दू धर्मग्रन्थों में साठ प्रकार के संवत्सरों का वर्णन मिलता है। चैत्र मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि से नये संवत्सर का आरम्भ होता है, यह अत्यन्त पवित्र तिथि है । इसी तिथि से पितामह ब्रह्माजी ने सृष्टिनिर्माण प्रारम्भ किया था- 'चैत्रे मासि जगत् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेsहनि। शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति।।' नूतन संवत्सर की इस प्रथम तिथि को रेवती नक्षत्र में, विष्कुम्भ योग में दिन के समय भगवान् के आदि अवतार मत्स्यरूप का प्रादुर्भाव भी माना जाता है- कृते च प्रभवे चैत्रे प्रतिपच्छुक्लपक्षगा । रेवत्यां योगविष्कुम्भे दिवा द्वादशनाडिका: ।। मत्स्यरूपकुमार्या च अवतीर्णो हरि: स्वयम् ।  (स्मृतिकौस्तुभ)


आनन्दोल्लास के पर्व होलिकोत्सव का महत्व

व सन्त पञ्चमी के आते ही प्रकृति में एक नवीन परिवर्तन आने लगता है। दिन छोटे हो जाते हैं। जाड़ा कम होने लगता है। उधर पतझड़ शुरू हो जाता है। माघ की पूर्णिमा पर होली का डंडा रोप दिया जाता है [होलाष्टक प्रारम्भ होने पर भी शाखा रोपी जाती है]। होली के पर्व के स्वागत हेतु आम्रमञ्जरियों पर भ्रमरावलियां मँडराने लगती हैं। वृक्षों में कहीं-कहीं नवीन पत्तों के दर्शन होने लगते हैं। प्रकृति में एक नयी मादकता का अनुभव होने लगता है। इस प्रकार होली पर्व के आते ही एक नवीन रौनक, नवीन उत्साह एवं उमंग की लहर दिखाई देने लगती  है। होली जहाँ एक ओर एक सामाजिक एवं धार्मिक त्यौहार है, वहीं यह रंगों का त्यौहार भी है। बालक,वृद्ध, नर-नारी-सभी इसे बड़े उत्साह से मनाते  हैं। इस देशव्यापी त्योहार में वर्ण अथवा जाति भेद का कोई स्थान नहीं।