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गंगा दशहरा व्रत विधि व पापनाशिनी गंगा जी की महिमा [गंगा दशहरा स्तोत्रम्]

भ द्रजनों,  धूंकाररूपिणी महाविद्या धूमावती जी की जयंती  के अगले दिन से प्रारम्भ होता है दस दिनात्मक गंगा दशहरा का पावन पर्व। धूर्जटी शिव शंकर की जटा से निकलने वाली माँ गंगा, जिनका जल जिस स्थान से होकर गया वे पवित्र तीर्थ बन गए।  हमारे हिन्दू धर्म ग्रन्थों में गौ, गंगा एवं गायत्री इन तीनों को पापनाशक त्रिवेणी बतलाया गया है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन कलिमल का दहन करने में सक्षम गंगाजी अवतरण हुआ था अतः इस इस अवसर पर  गंगास्नान का विशेष महत्व   बताया गया है।  आइये पहले माँ गंगा के स्वरूप का चिंतन करते हैं। माँ गंगा जी का ध्यान इस प्रकार है- सितमकर-निषण्णां शुक्लवर्णां त्रिनेत्राम् करधृत-कमलो-द्यत्सूत्पलाऽभीत्यभीष्टाम् । विधिहरिहर-रूपां सेन्दु-कोटीरचूडाम् कलितसितदुकूलां जाह्नवीं तां नमामि ॥ अर्थात्  श्वेत मकर पर विराजित, शुभ्र वर्ण वाली, तीन नेत्रों वाली, दो हाथों में भरे हुए कलश तथा दो हाथों में सुंदर कमल धारण किए हुए, भक्तों के लिए परम इष्ट, ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तीनों का रूप अर्थात् तीनों के कार्य करने वाली,...


धूमावती माँ अपने भक्तों के कल्याण हेतु रहती हैं सदा तत्पर

श्री शनिदेव की जयंती  के सात दिन बाद की तिथि अर्थात्   ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि धूमावती महाविद्या की जयन्ती तिथि है। जो व्यक्ति तंत्र के विषय में जानकारी रखते हैं वे दस महाविद्याओं से भी अवश्य परिचित होंगे। इन्हीं दस महाविद्याओं में से एक महाविद्या हैं धूमावती महाविद्या। ये विश्व की अमांगल्यपूर्ण-अवस्था की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। वृद्धारूपा, भूख-प्यास से व्याकुल, अत्यंत रूक्ष नेत्रों वाली, विरूपा और भयानक आकृति वाली होती हुई भी अत्यंत शक्तिमयी धूमावती देवी अपने भक्तों के कल्याण हेतु सदा तत्पर रहती हैं। इनका ध्यान इस प्रकार है: धूमावती जी का ध्यान  विवर्णा चंचला दुष्टा दीर्घा च मलिनाम्बरा।   विमुक्तकुन्तला रूद्रा विधवा विरलद्विजा॥   काकध्वजरथारूढा विलम्बितपयोधरा।   शूर्पहस्तातिरुक्षा च धूतहस्ता वरानना॥   प्रवृद्धघोषणा सा तु भृकुटिकुटिलेक्षणा।   क्षुत्पिपासार्दिता नित्यं भयदा कलहास्पदा॥ अर्थात् धूमावती जी, विवर्णा, चंचला, दुष्टा व दीर्घ तथा गलित अंबर [वस्त्र] धारण करने वाली, खुले केशों वाली, विरल दांत वा...


शनिदेव हैं सूर्यपुत्र तथा दंडाधिकारी [दशरथ कृत शनि स्तोत्र]

ह मारे हिंदू धर्मग्रन्थों में ज्येष्ठ मास की प्रतिपदा तिथि को   नारद जी की जयंती कहा गया है तथा ज्येष्ठ मास की अमावास्या को  'शनि जयंती'  बतलाई गई है। ध्यातव्य है कि कुंडली में कई योग ऐसे हैं जिनमें शनि ग्रह की क्रूर दृष्टि से जातक को पीड़ा मिलती है इसीलिए बहुत से लोग शनिदेव को क्रूर ग्रह मानते हैं पर वास्तव में शनि तो प्रारब्ध के बुरे कर्मों का फल ही देते हैं और अंत में जातक को धार्मिक भी बना देते हैं; और हमारे शास्त्रों में कहा भी गया है कि कोई भी ग्रह यदि बुरे प्रभाव दे या पीड़ा दे तो उसकी उपेक्षा मत कीजिये क्योंकि इससे तो और अधिक बुरे परिणाम मिलेंगे। बल्कि हमें उन ग्रहों को पूजना चाहिए। उनके निमित्त जपदान किया जाना चाहिए इससे उन ग्रहों द्वारा कुंडली में उत्पन्न अशुभता में कमी आती है।   स्वयं महादेव ने शनिदेव को बुरे कर्म करने वालों को दंड देने का अधिकार दिया था ।  ज्येष्ठी अमावास्या को दंडाधिकारी शनिदेव की जयंती कही गयी है।  उस पर भी शनैश्चरी अमावास्या पर शनि देव की स्तुति करने का बड़ा ही महत्व है। शनैः चरति ...


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